मिल जाता
चंद
लम्हों का अहसास
तुम्हारे
साथ होने का,
गुनगुनाता
तुम्हारे गीत
मेरा
आशियाँ आज भी.
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ख्वाबों का आशियाँ
अब भी है
बेताब
रात की
तन्हाई में
सुनने को
एक आहट
तुम्हारे कदमों की.
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अश्क़ भी हैं भूल गए
नयनों से
गिरना,
रह गयीं
सूखी लक़ीरें
तप्त
कपोलों पर
तुम्हारे
इंतज़ार में.
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मिल जाते पंख
भरने लगता उड़ान
ठहरा हुआ वक़्त,
पाकर तुम्हारा साथ
कुछ पल को.
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क्यूँ
दिखाए सपने
खुली
आँखों से
ग़र तोड़ना
ही था,
मेरी वफ़ा
का बाँध
बहने भी
नहीं देता
इन्हें
अश्क़ों के साथ.
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मिल जाते पंख
भरने लगता उड़ान
ठहरा हुआ वक़्त,
पाकर तुम्हारा साथ
कुछ पल को.
कैलाश शर्मा




