Tuesday, November 17, 2015
ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री
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Kashish-My Poetry,
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रक़ीब,
राह,
शाम,
हबीब
Tuesday, November 03, 2015
क्षणिकाएं
उबलते
रहे अश्क़
दर्द की कढ़ाई में,
सुलगते रहे स्वप्न
भीगी लकड़ियों से,
धुआं धुआं होती ज़िंदगी
तलाश में एक सुबह की
छुपाने को अपना अस्तित्व
भोर के कुहासे में।
दर्द की कढ़ाई में,
सुलगते रहे स्वप्न
भीगी लकड़ियों से,
धुआं धुआं होती ज़िंदगी
तलाश में एक सुबह की
छुपाने को अपना अस्तित्व
भोर के कुहासे में।
*****
होते
हैं कुछ प्रश्न
नहीं जिनके उत्तर,
हैं कुछ रास्ते
नहीं जिनकी कोई मंजिल,
भटक रहा हूँ
ज़िंदगी के रेगिस्तान में
एक पल सुकून की तलाश में,
खो जायेगा वज़ूद
यहीं कहीं रेत में।
नहीं जिनके उत्तर,
हैं कुछ रास्ते
नहीं जिनकी कोई मंजिल,
भटक रहा हूँ
ज़िंदगी के रेगिस्तान में
एक पल सुकून की तलाश में,
खो जायेगा वज़ूद
यहीं कहीं रेत में।
...©कैलाश शर्मा
Friday, October 23, 2015
तलाश शून्य की
भटकता तलाश में शून्य की
घिर जाता और भी
अहम् के चक्रव्यूह में,
अपनी हर सोच
अपनी हर उपलब्धि
कर देती जटिल और भी
चक्रव्यूह के हर घेरे को।
घिर जाता और भी
अहम् के चक्रव्यूह में,
अपनी हर सोच
अपनी हर उपलब्धि
कर देती जटिल और भी
चक्रव्यूह के हर घेरे को।
अहम् खींच देता रेखा
बीच में अहम् और 'मैं' के,
अहम् की ऊँची दीवारों में
विस्मृत हो जाता 'मैं'
अंतस के किसी कोने में,
अहम् का चक्रव्यूह कर देता दूर
स्वयं अपने से और अपनों से
और डूबने लगता मन
असीम गह्वर में अतृप्त शून्य के।
बीच में अहम् और 'मैं' के,
अहम् की ऊँची दीवारों में
विस्मृत हो जाता 'मैं'
अंतस के किसी कोने में,
अहम् का चक्रव्यूह कर देता दूर
स्वयं अपने से और अपनों से
और डूबने लगता मन
असीम गह्वर में अतृप्त शून्य के।
तलाश शून्य की
जब होती प्रारंभ और अंत 'मैं' पर
होने लगती पहचान
स्वयं अपने से और अपनों से
और अनुभव एक अद्भुत शून्य का
जहाँ खो देता अस्तित्व अहम्
गहन शून्य 'मैं' के आह्लाद में।
होने लगती पहचान
स्वयं अपने से और अपनों से
और अनुभव एक अद्भुत शून्य का
जहाँ खो देता अस्तित्व अहम्
गहन शून्य 'मैं' के आह्लाद में।
...©कैलाश शर्मा
Sunday, October 11, 2015
कुछ क़दम तो चलें
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मोड़,
सपने
Thursday, October 01, 2015
उम्र
उम्र नहीं केवल एक जोड़
हर वर्ष बढ़ते हुए कुछ अंकों का,
बढ़ते जाना अंकों का
नहीं है अर्थ
हो जाना व्यर्थ पिछले अंकों का,
उम्र नहीं केवल एक अंक
उम्र है संग्रह अनुभवों का,
उम्र है उत्साह
कदम अगला उठाने का,
उम्र है एक द्रष्टि
अँधेरे के परे प्रकाश देख पाने की,
उम्र है एक सोच
प्रति पल एक नयी उपलब्धि की।
हर वर्ष बढ़ते हुए कुछ अंकों का,
बढ़ते जाना अंकों का
नहीं है अर्थ
हो जाना व्यर्थ पिछले अंकों का,
उम्र नहीं केवल एक अंक
उम्र है संग्रह अनुभवों का,
उम्र है उत्साह
कदम अगला उठाने का,
उम्र है एक द्रष्टि
अँधेरे के परे प्रकाश देख पाने की,
उम्र है एक सोच
प्रति पल एक नयी उपलब्धि की।
नहीं रखता कोई अर्थ
अंको का छोटा या बड़ा होना,
अंको का छोटा या बड़ा होना,
उम्र है केवल एक अनुभूति
अंको से परे जीवन की
जहाँ खो देते अंक
अस्तित्व अपने होने का।
अंको से परे जीवन की
जहाँ खो देते अंक
अस्तित्व अपने होने का।
....©कैलाश शर्मा
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Saturday, September 26, 2015
प्रकाश स्तम्भ
प्रकाश स्तम्भ
नहीं एक मंज़िल,
सिर्फ़ एक संबल
दिग्भ्रमित नौका को,
दिखाता केवल राह
लेना होता निर्णय
चलाना होता चप्पू
स्वयं अपने हाथों से।
नहीं एक मंज़िल,
सिर्फ़ एक संबल
दिग्भ्रमित नौका को,
दिखाता केवल राह
लेना होता निर्णय
चलाना होता चप्पू
स्वयं अपने हाथों से।
आसान है सौंप देना
नाव लहरों के सहारे
शायद पहुंचे किसी तट पर
न हो जो इच्छित मंज़िल
या डूब जाए बीच धारा में,
केवल प्रकाश स्तम्भ
या पतवार नौका में
कब है पहुंचाती
नाव लहरों के सहारे
शायद पहुंचे किसी तट पर
न हो जो इच्छित मंज़िल
या डूब जाए बीच धारा में,
केवल प्रकाश स्तम्भ
या पतवार नौका में
कब है पहुंचाती
इच्छित मंज़िल को,
करनी होती स्थिर
दृष्टि प्रकाश स्तम्भ पर,
चलाने होते पतवार अपने हाथों से
रोकने को बहने से नाव
लहरों के साथ।
करनी होती स्थिर
दृष्टि प्रकाश स्तम्भ पर,
चलाने होते पतवार अपने हाथों से
रोकने को बहने से नाव
लहरों के साथ।
....©कैलाश शर्मा
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संबल
Sunday, September 13, 2015
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