Saturday, September 03, 2011

इतना बंदी मत करो मुझे अहसानों से....

इतना बंदी  मत करो मुझे अहसानों से,
कि आखिर को प्रतिदान नहीं मैं दे पाऊँ.

विस्मृत अस्तित्व होगया जब मुझसे मेरा,
अहसान तेरे सदियों  के कैसे  याद रहें.
जलने दो जो जलती मुस्कानों की होली,
इतने आंसू मत गिरो, नहीं मैं चुन पाऊँ.

किस किस उपवन के अंचल को दोगी वसंत, 
हर उपवन में पतझड़ का शाश्वत शासन है.
आकर्षित मुझको करो न दीपक से क्योंकि
शायद  प्रकाश के  बदले  निशा न  दे पाऊँ.

इस क्षणिक मिलन से अभिप्रेत है चिर वियोग,
इस चिर  अभाव में  चिर  तृप्ति का साधन है.
रहने  दो  उर में  आस  अधूरी  मिलने  की,
अमरत्व मिलन के बाद न स्वीकृत कर पाऊँ.

इतना  बंदी मत करो  मुझे अहसानों से,
कि आखिर को प्रतिदान नहीं मैं दे पाऊँ.

Tuesday, August 30, 2011

आसमान की चाहत

आसमान छूने की चाहत में
कितने दूर हो जाते हैं 
हम ज़मीन से.

रिश्तों की दीवारें
ढह जाती हैं
स्वार्थों की चोट से,
चढ़ जाती है 
स्नेह पर
गुरुत्व की परत,
चलते हैं
गढा कर नज़रें
आसमां पर
और कुचलते 
स्वप्न और अरमान 
अपनों के,
पैरों तले.

लेकिन पाते हैं एक दिन 
अपने आप को अकेला
दूर क्षितिज पर,
तरसते 
एक कोमल नन्हे हाथ को
जो पोंछ दे आंसू
अकेलेपन के.