इतना बंदी मत करो मुझे अहसानों से,
कि आखिर को प्रतिदान नहीं मैं दे पाऊँ.
विस्मृत अस्तित्व होगया जब मुझसे मेरा,
अहसान तेरे सदियों के कैसे याद रहें.
जलने दो जो जलती मुस्कानों की होली,
इतने आंसू मत गिरो, नहीं मैं चुन पाऊँ.
किस किस उपवन के अंचल को दोगी वसंत,
हर उपवन में पतझड़ का शाश्वत शासन है.
आकर्षित मुझको करो न दीपक से क्योंकि
शायद प्रकाश के बदले निशा न दे पाऊँ.
इस क्षणिक मिलन से अभिप्रेत है चिर वियोग,
इस चिर अभाव में चिर तृप्ति का साधन है.
रहने दो उर में आस अधूरी मिलने की,
अमरत्व मिलन के बाद न स्वीकृत कर पाऊँ.
इतना बंदी मत करो मुझे अहसानों से,
कि आखिर को प्रतिदान नहीं मैं दे पाऊँ.
