Saturday, April 19, 2014

परछाइयां

भागते रहते जीवन भर   
पीछे परछाइयों के
कभी आकांक्षाओं की  
कभी रिश्तों की.

नहीं चलती परछाई
कभी साथ साथ,
भागती कभी आगे
रह जाती कभी पीछे,
ज़िंदगी की तपिश
जब होती सर पर
ढूंढ लेती आश्रय
तुम्हारे अस्तित्व में.

जीवन संध्या में
हो जाती गुम
अन्धकार के आवरण में
छोड़ सहने को
दर्द अकेलेपन का.

काश समझ पाते
नहीं होता कोई संबल
किसी परछाई का,
देती है साथ
केवल उजाले में
तुम्हारे अस्तित्व का.


....कैलाश शर्मा 

44 comments:

  1. परछाई की क्रीड़ा निराली है। जब इसकी जरूरत होती यह छोड़ कर चली जाती है।

    ReplyDelete
  2. जीवन संध्या में
    हो जाती गुम
    अन्धकार के आवरण में
    छोड़ सहने को
    दर्द अकेलेपन का.......सत्य जीवन का.....

    ReplyDelete
  3. sahi baat ki ...parchhaiyan kab apni huyee hai

    ReplyDelete
  4. परछाई अपनी
    किसके समझ
    में कभी आई
    हरजाई ।

    ReplyDelete
  5. बहुत सुंदर व्याख्या की है परछाई की

    ReplyDelete
  6. काश समझ पाते
    नहीं होता कोई संबल
    किसी परछाई का,
    देती है साथ
    केवल उजाले में
    तुम्हारे अस्तित्व का.

    बिलकुल सच कहा आपने ! गहन सोच लिये एक बहुत ही सुंदर रचना !

    ReplyDelete
  7. आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (20-04-2014) को ''शब्दों के बहाव में'' (चर्चा मंच-1588) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर

    ReplyDelete
  8. जीवन संध्या में
    हो जाती गुम
    अन्धकार के आवरण में
    छोड़ सहने को
    दर्द अकेलेपन का.
    vastvikta se ot-prot sundar bhavtamak abhivaykti .badhai

    ReplyDelete
  9. कैसी मृगतृष्णा - जो उबरने भी नहीं देती !

    ReplyDelete
  10. नहीं होता कोई संबल
    किसी परछाई का,
    देती है साथ
    केवल उजाले में
    तुम्हारे अस्तित्व का.

    सच कहा आपने

    ReplyDelete
  11. अजब सी छटपटाहट घुटन कसकन है असह पीडा
    समझ लो साधना की अवधि पूरी है ।
    अरे घबरा न मन चुपचाप सहता जा
    सृजन में दर्द का होना ज़रूरी है ।
    अशोक चक्रधर [ इन्हें 2014 में पद्म श्री सम्मान मिला है ।]

    ReplyDelete
  12. -सुंदर रचना...
    आपने लिखा....
    मैंने भी पढ़ा...
    हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 21/04/ 2014 की
    नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
    आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
    हलचल में सभी का स्वागत है...

    ReplyDelete
  13. बहुत ही सुन्दर फुर्सत से पढ़ता हूँ .. आभार ..

    ReplyDelete
  14. zindagi ka bahut hi katy satya hai ye

    ReplyDelete
  15. सच है परछाई भी रौशनी हो जीवन में तो साथ देती है ... अन्धेरा अकेले ही पार करना होता है ... इश्वर के सहारे ...

    ReplyDelete
  16. अंधेरे में परछाई भी डरती है शायद,,तभी उजाला खोती है.....बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  17. बहुत ही सुन्दर बेहतरीन प्रस्तुति,आभार आपका।

    ReplyDelete
  18. काश समझ पाते
    नहीं होता कोई संबल
    किसी परछाई का,
    देती है साथ
    केवल उजाले में
    तुम्हारे अस्तित्व का....
    jst wow......

    ReplyDelete
  19. सुंदर और अर्थपूर्ण ...

    ReplyDelete
  20. गहरी बात .... बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  21. बहुत ही सुन्दर बेहतरीन प्रस्तुति,आभार आपका।

    Recent Post शब्दों की मुस्कराहट पर ….अब आंगन में फुदकती गौरैया नजर नहीं आती

    ReplyDelete
  22. नहीं चलती परछाई
    कभी साथ साथ,
    भागती कभी आगे
    रह जाती कभी पीछे,
    ज़िंदगी की तपिश
    जब होती सर पर
    ढूंढ लेती आश्रय
    तुम्हारे अस्तित्व में.


    अर्थपूर्ण अभिव्यंजना सशक्त भाव प्रवाह लिए है यह रचना।

    ReplyDelete
  23. यही जीवन का सत्य... अँधेरे में परछाई भी साथ नहीं देती. भावपूर्ण रचना के लिए बधाई.

    ReplyDelete
  24. पर हम सत्य समझ नहीं पाते हैं..सुन्दर रचना.

    ReplyDelete
  25. मरीचिका की तरह है परछाईं की तलाश...अनजाने ही आकाँक्षाओं और रिश्तों में छाये खोजता फिरता है आदमी...

    ReplyDelete
  26. बहुत सुंदर , भाई जी !! मंगलकामनाएं आपको !

    ReplyDelete
  27. नहीं चलती परछाई
    कभी साथ साथ,
    भागती कभी आगे
    रह जाती कभी पीछे,

    यथार्थपरक सशक्त रचना ....

    ReplyDelete
  28. जीवन के एक यथार्थ सत्य को परछाई का बिम्ब लेकर कितनी सुगमता से समझाया है रचना में ,उजाले में सब साथ देते हैं अपने हिस्से का अन्धकार खुद ही भुगतना होता है ...बहुत खूब हार्दिक बधाई आपको आ० कैलाश जी .

    ReplyDelete
  29. सत्य वचन, परछाई हमारी है लेकिन साथ सिर्फ़ उजाले मे देती है

    ReplyDelete
  30. सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  31. जीवन के भावो को व्यकत करती एक सुन्दर रचना !!

    मेरे ब्लॉग की नयी पोस्ट "मै मख्खन बेचता हूँ " पढ़ने के लिए मेरे ब्लॉग manojbijnori12.blogspot.com पर आये

    ReplyDelete
  32. जीवन संध्या में
    हो जाती गुम
    अन्धकार के आवरण में
    छोड़ सहने को
    दर्द अकेलेपन का-------
    परछाई को क्या खूब विश्लेषित किया है
    वाह बहुत सुन्दर----

    आग्रह है----
    और एक दिन

    ReplyDelete
  33. जीवन संध्या में
    हो जाती गुम
    अन्धकार के आवरण में
    छोड़ सहने को
    दर्द अकेलेपन का.
    ​एकदम सत्य और सार्थक शब्द

    ReplyDelete
  34. बिल्कुल सही कहा है,परछाई जब तक साथ है जब तक हमारा वजूद,अस्तित्व साथ है।

    ReplyDelete