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Thursday, January 17, 2019

क्षणिकाएं

मत बांटो ज़िंदगी
दिन, महीनों व सालों में,
पास है केवल यह पल
जियो यह लम्हा
एक उम्र की तरह।
****

रिस गयी अश्क़ों में
रिश्तों की हरारत,
ढो रहे हैं कंधों पर
बोझ बेज़ान रिश्तों का।
****

एक मौन
एक अनिर्णय
एक गलत मोड़
कर देता सृजित
एक श्रंखला
अवांछित परिणामों की,
भोगते जिन्हें अनचाहे
जीवन पर्यंत।

...©कैलाश शर्मा

Friday, October 27, 2017

चलो पथिक आगे बढ़ जाओ

चलो पथिक आगे बढ़ जाओ,
यहाँ किसी का साथ न होगा।
नियति है तेरी चलना तनहा,
यहाँ कोइ हमराह न होगा।

कुछ पल की रौनक है जीवन,
फिर आगे का सफ़र अकेला।
इक दिन अंत इसे है होना,
हर दिन कहाँ चले है मेला।

कच्चे धागे से सब रिश्ते,
कब तक साथ निभा पायेंगे।
बोझ बढाओ मत कंधों पर,
कितनी दूर उठा पायेंगे।

छांव मिलेगी नहीं राह में,  
मरुथल से है तुम्हें गुज़रना|
अश्क़ रखो अपने संभाल के
अभी बहुत कुछ आगे सहना|      

सक्षम करलो तुम पग अपने,
अभी राह में शूल बहुत हैं।
भ्रमित न हो खुशियों के पल में
अभी तो मंजिल दूर बहुत है।

दुखित न हो पिछली भूलों से,
दे कर गयीं सबक जीवन का।
कौन सदा का साथ यहां है,
चलना यहां अकेला पड़ता।

...©कैलाश शर्मा

Wednesday, August 23, 2017

क्षणिकाएं

व्याकुल हैं भाव
उतरने को पन्नों पर,

लेकिन सील गये पन्ने
रात भर अश्कों से,
सियाही लिखे शब्दों की
बिखर जाती पन्नों पर
और बदरंग हो जाते पन्ने
गुज़री ज़िंदगी की तरह।।
      *****

क्यों उलझ जाती ज़िंदगी 
रिश्तों के जाल में,
होता कठिन सुलझाना
इस मकड़जाल को,
न ही तोड़ पाते 
न ही सुलझा पाते 
उलझे धागे,
कितना कठिन निकलना बाहर 
और जी पाना मुक्त बंधनों से।
     *****

काश पढ़ ही लेते
अपने दिल की क़िताब,
मिल जाते उत्तर
मुझसे पूछे
अनुत्तरित प्रश्नों के।


...©कैलाश शर्मा

Tuesday, January 19, 2016

किस किस का अहसास लिखूं मैं

मन की टूटी आस लिखूं मैं,
अंतस का विश्वास लिखूं मैं,
फूलों का खिलने से लेकर
मिटने का इतिहास लिखूं मैं।

रोटी को रोते बच्चों का,
तन के जीर्ण शीर्ण वस्त्रों का,
चौराहे बिकते यौवन का
या सपनों का ह्रास लिखूं मैं,
किस किस का इतिहास लिखूं मैं।

रिश्तों का अवसान है देखा,
बिखरा हुआ मकान है देखा,
वृद्धाश्रम कोनों से उठती
क्या ठंडी निश्वास लिखूं मैं,
क्या जीवन इतिहास लिखूं मैं।

आश्वासन होते न पूरे,
वादे रहते सदा अधूरे,
धवल वसन के पीछे काले
कर्मों का इतिहास लिखूं मैं,
टूटा किसका विश्वास लिखूं मैं।

टूट गए जब स्वप्न किसी के
मेहंदी रंग हुए जब फ़ीके,
पलकों पर ठहरे अश्क़ों की
न गिरने की आस लिखूं मैं,
किस किस का अहसास लिखूं मैं।

जीवन में अँधियारा गहरा
मौन गया आँगन में ठहरा,
कैसे अपने सूने मन की
फिर खुशियों की आस लिखूं मैं,
कैसे अपना इतिहास लिखूं मैं।

...©कैलाश शर्मा

Monday, April 20, 2015

सीढ़ियां

बढ़ते ही कुछ आगे सीढ़ियों पर 
हो जाते विस्मृत संबंध व रिश्ते,
निकल जाते अनज़ान हो कर
बचपन के हमउम्र साथियों से 
जो खेल रहे क्रिकेट
नज़दीकी मैदान में।

खो जाती स्वाभाविक हँसी
बनावटी मुखोटे के अन्दर,
खो जाता अन्दर का छोटा बच्चा
अहम् की भीड़ में।
विस्मृत हो जातीं पिछली सीढ़ियां
जिनके बिना नहीं अस्तित्व
किसी अगली सीढ़ी का।

कितना कुछ खो देते
अपने और अपनों को,
आगे बढ़ने की दौड़ में।

...कैलाश शर्मा 

Monday, October 27, 2014

चौराहा

चौराहे पर खड़ा हूँ कब से, 
भ्रमित चुनूँ मैं राह कौन सी।
कौन राह मंज़िल को जाए,
अंध गली ले जाय कौन सी।

जितने पार किये चौराहे,
नया दर्द हर राह दे गयी।
बोझ बढ़ गया है कंधों पे,

दृष्टि धूमिल आज हो गयी।

कितने मीत बने रस्ते में,
चले गये सब अपनी राहें।
दूर कारवां चला गया है,
तकता अब बस सूनी राहें।

सूनी राहों पर चलते रहना,
शायद यही नियति है मेरी।
घिरा हुआ था कभी भीड़ से,
भूल गया क्या खुशियाँ मेरी।

क्या उद्देश्य यहाँ आने का,
भूल गया जग की माया में।
अंतस की आवाज़ सुनी न,
कुछ पल रिश्तों की छाया में।

सांध्य अँधेरा लगा है बढ़ने,
नहीं सुबह की आस है बाक़ी।
पैमाना खाली, पर उठ चल,
चली गयी महफ़िल से साक़ी।

....कैलाश शर्मा  

Saturday, October 04, 2014

अब मैंने जीना सीख लिया

कर बंद पिटारा सपनों का,
बहते अश्क़ों को रोक लिया.
अंतस को जितने घाव मिले
स्मित से उनको ढांक लिया.

विस्मृत कर अब सब रिश्तों को,
अब मैंने फ़िर जीना सीख लिया.

करतल पर खिंची लकीरों को
है ख़ुद मैंने आज खुरच डाला.
अब किस्मत की चाबी मुट्ठी में,
खोलूँगा सभी बेड़ियों का ताला.

नहीं चाह फूलों से आवृत राहें हों,
मैंने काँटों पर चलना सीख लिया.

हर घर में पड़ी खरोंचें हैं,
अहसासों की दीवारों पर.
हर सांसें आज घिसटती हैं,
अश्रु हैं रुके किनारों पर.          

अब पीछे मुड़ कर मैं क्यों देखूं,
सूनी राहों पर चलना सीख लिया.

क्यूँ करूँ तिरस्कृत अँधियारा,
मैं अब इंतज़ार में सूरज के.
है रहा साथ जो जीवन भर,
कैसे चल दूँ उसको तज के.

अब एकाकीपन नहीं सताता है,
आईने में अब साथी ढूंढ लिया.


....कैलाश शर्मा 

Saturday, April 19, 2014

परछाइयां

भागते रहते जीवन भर   
पीछे परछाइयों के
कभी आकांक्षाओं की  
कभी रिश्तों की.

नहीं चलती परछाई
कभी साथ साथ,
भागती कभी आगे
रह जाती कभी पीछे,
ज़िंदगी की तपिश
जब होती सर पर
ढूंढ लेती आश्रय
तुम्हारे अस्तित्व में.

जीवन संध्या में
हो जाती गुम
अन्धकार के आवरण में
छोड़ सहने को
दर्द अकेलेपन का.

काश समझ पाते
नहीं होता कोई संबल
किसी परछाई का,
देती है साथ
केवल उजाले में
तुम्हारे अस्तित्व का.


....कैलाश शर्मा 

Saturday, November 23, 2013

क्षितिज

भूल कर ज़मीन पैरों तले
और सिर ऊपर आसमान,
विस्मृत कर रिश्ते और संबंध
बढ़ता गया आगे 
छूने की चाह में 
आकांक्षाओं का क्षितिज।

जब भी बढाया हाथ 
छूने को क्षितिज
पाया उसे उतना ही दूर 
जितना यात्रा के प्रारंभ में।

खड़ा हूँ आज 
उसी ज़मीन पर 
उसी आसमान तले
जूझता अकेलेपन से 
क्षितिज से दूर।


....कैलाश शर्मा  

Thursday, June 13, 2013

कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहने दें

सारा जीवन गंवा दिया है
प्रश्नों के उत्तर देने में,
बैठें भूल सभी बंधन को,
कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहने दें.

सूरज पाने की चाहत में,
शीतलता शशि की बिसरायी,
टूटे तारों से अब क्या मांगें,
अब आस यहीं पर थमने दें.

रिश्ते बने कभी ज़ंजीरें,
यादें बनीं कभी अंगारे,
बंद करें मुट्ठी में कुछ पल,
कल को कल पर ही रहने दें.

तप्त धूप में चलते चलते
सूख गयी जीवन की सरिता,
क्यों ढूंढें छाया तरुवर की
अपनी छाया ही साथी बनने दें.

धोखा खाया जब अपनों से
शिकवा गैरों से क्यों कर हो,
ढूंढें खुशियाँ अपने अन्दर,
जीवन अब निर्झर बहने दें. 


.....कैलाश शर्मा 

Wednesday, May 29, 2013

तलाश अस्तित्व की


जो भी मिला जीवन में
चढ़ाये था एक मुखौटा
अपने चेहरे पर,
हो गया मज़बूर मैं भी
समय के साथ चलने,
चढ़ा लिए मुखौटे
अपने चेहरे पर.

तंग आ गया हूँ
बदलते हर पल
एक नया मुखौटा
हर सम्बन्ध, हर रिश्ते को.
रात्रि को जब
टांग देता सभी मुखौटे
खूंटी पर,
दिखाई देता आईने में
एक अज़नबी चेहरा
और ढूँढता अपना अस्तित्व
मुखौटों की भीड़ में.

सोचता हूँ बहा दूँ
सभी मुखौटे नदी में
और देखूं असली रूप
अपने अस्तित्व का
और प्रतिक्रिया संबंधों की.

...कैलाश शर्मा 

Saturday, April 20, 2013

२००वीं पोस्ट - हैवानियत


                                     (चित्र गूगल से साभार)
क्यों पसरती जा रही
हैवानियत इंसानों में,
क्यों घटता जा रहा अंतर
मानव और दानव में,
क्यों हो गया मानव
घृणित दानव से भी?

भूल गया सभी रिश्ते और उम्र
दिखाई देती केवल एक देह,
बेमानी हो गए शब्द
प्रेम, वात्सल्य और स्नेह,
आँखों में है केवल भूख
झिंझोड़ने की एक देह,
कानून व्यवस्था सब बेमानी
बंधी हुई है पट्टी आँखों पर,
देखने तमाशा जुड़ जाती भीड़
पर बढ़ता नहीं कोई हाथ
करने को सामना.

नहीं आयेगी कोई दुर्गा
करने दानव दलन,
उठना होगा तुम्हें ही
बनना होगा दुर्गा
करने दानवों का शमन,
उठाओ खड्ग और खप्पर
पीने को लहू इन रक्तबीजों का,
गिरने न पाए लहू की
एक बूँद भी पृथ्वी पर,
पैदा न हो पाए फिर कोई
रक्तबीज धरा पर.

......कैलाश शर्मा 

Sunday, January 13, 2013

हाइकु

१)
न होता दुःख 
गर समझ पाता,
स्वार्थी रिश्तों को.

२)
रिश्तों की नाव
डगमगाने लगी,
मंजिल दूर.

३)
नयन उठे,
बेरुखी थी आँखों में,
बरस गये.

४)
रात्रि या दिन
क्या फ़र्क पड़ता है,
सूना जीवन.


५)
घना अँधेरा                         
हर कोना है सूना,
ज़िंदगी मौन.

६)
ज़िंदगी बता              
क्या खता रही मेरी,
तू रूठ गयी.

७)
कदम उठे                      
रोका था देहरी ने, 
ठहर गये.

८)
सांस घुटती                                  
रिश्तों की दीवारों में,
बाहर चलें.

कैलाश शर्मा