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Friday, August 16, 2013

आँख में फ़िर से नमी छाई है

आज़ फ़िर काली घटा छाई है,
आँख में फ़िर से नमी छाई है.

है नहीं कोई सुने आवाज़ मेरी,
सिर्फ़ मैं और मेरी तनहाई है.

चलते रहे बोझ उठाए सर पर,
धूप में न छांव नज़र आई है.

सर्द अहसास हुए इस हद तक,
खून में घुल गयी सियाही है. 

अब न ज़लते चराग उमीदों के,
ज़ब से आंधी फ़लक पे छाई है.

आज फ़िर खुल के बहेंगे आंसू,
साथ देने बरसात चली आई है.

...कैलाश शर्मा 


Tuesday, July 02, 2013

आज़ ज़ज्बातों को गंगा में बहा आया हूँ

आज़ ज़ज्बातों को गंगा में बहा आया हूँ,
टूटे ख़्वाबों को मैं खुद ही ज़ला आया हूँ.

अब न पैरों में चुभेंगी यादों की किरचें,
मैं उन्हें उनको ही सौगात में दे आया हूँ.

अब न रिश्ते की ज़रुरत है, न रहबर की,
साथ तनहाई को मैं अब घर ले आया हूँ.

मौन की भाषा समझ पायी है कब दुनियां,
बाद खोने के तुम्हें अब ये समझ पाया हूँ.

अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.

...कैलाश शर्मा 

Monday, June 24, 2013

ख़ुदा खैर करे

आये बड़ी उम्मीद से, ख़ुदा खैर करे,
तेरे दर मौत मिली, ख़ुदा खैर करे.

दिल दहल जाता है देख कर मंज़र,       
क्या गुज़री उन पर, ख़ुदा खैर करे.

उभर आती मुसीबत में असली सीरत,
लूटते हैं लाशों को भी, ख़ुदा खैर करे.

मुसीबतज़दा को कभी हाथ बढ़ा करते थे,  
भूखे से भी करें व्यापार, ख़ुदा खैर करे.

इंसानियत हो रही शर्मसार आज इंसां से,
दो सौ रुपये में दें पानी, ख़ुदा खैर करे.

होंगे शर्मिंदा बहुत आज तो तुम भी भगवन,
तेरे बंदे ही तुझे लूट चले, ख़ुदा खैर करे.

.....कैलाश शर्मा  

Tuesday, June 04, 2013

सुबह ढूंढेंगे फ़िर सपने, अभी तो शाम ढलती है


इन हथेली की लकीरों से, कहाँ तक़दीर बनती है,
मुसाफ़िर ही सदा चलते, कभी मंज़िल न चलती है.

चलो अब घर चलें, सुनसान कोने राह तकते हैं,
सुबह ढूंढेंगे फ़िर सपने, अभी तो शाम ढलती है.

यकीं है आख़िरी पल तक, वो इक बार आयेंगे,
रुको कुछ देर तो यारो, अभी तो साँस चलती है.

उठे न उंगलियां तुम पर, यही कोशिश रही अपनी,
शिकायत क्या करें उससे, जो गुनहगार कहती है.

रवायत इश्क़ की तेरी, समझ पाया न ये दिल है,
नहीं अब वक़्त भी बाक़ी, घड़ी की सुई चलती है.

कि देने छांव रिश्तों को, बनाया आशियां हमने,
दीवारें हो गयीं ज़र्ज़र, कि छत भी अब टपकती है.

....कैलाश शर्मा