नज़र बचा कर
गुज़र गया वो, जैसे मैं अनजाना चेहरा,
धुंधली
पड़ती नज़र ने शायद, देखा था अनजाना चेहरा.
आकर गले
लिपट जाता था, ज़ब भी घर में मैं आता था,
कैसे उसको
आज हो गया, मैं बस इक अनजाना चेहरा.
उंगली पकड़
सिखाया चलना, बोझ लगा न वह कंधों पर,
जब अशक्त
हो गये ये कंधे, लगता उसको बेगाना चेहरा.
स्वारथ की
आंधी में उजड़े, कितने बाग़ यहाँ रिश्तों के,
अब तो घर
घर में दिखता है, मुझको बस अनजाना चेहरा.
नहीं
प्रेम आदर जब उर में, पितृ दिवस का अर्थ न कोई,
धुंधली
आँखों को नज़र न आया, अब कोई पहचाना चेहरा.
(अगज़ल/अभिव्यक्ति)
....कैलाश शर्मा
