इश्क़ को ज़ब से बहाने आ गए,
दर्द भी अब आज़माने आ गए।
दर्द की रफ़्तार कुछ धीमी हुई,
और भी गम आज़माने आ गए।
कौन कहता है अकेला हूँ यहाँ,
याद भी हैं साथ देने आ गए।
रात भर थे साथ में आंसू मिरे,
सामने तेरे छुपाने आ गए।
हाथ में जब हाथ था आने लगा,
बीच में फिर से ज़माने आ गए।
(अगज़ल/अभिव्यक्ति)
....©कैलाश शर्मा