मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश:
चौदहवां अध्याय
(गुणत्रयविभाग-योग-१४.२१-२७)
चौदहवां अध्याय
(गुणत्रयविभाग-योग-१४.२१-२७)
अर्जुन
उनके क्या लक्षण हैं भगवन
जो त्रिगुणों से ऊपर उठ जाता.
कैसा है व्यवहार वह करता
कैसे त्रिगुणों के पार है जाता. (१४.२१)
श्री भगवान
ज्ञान, कर्म, मोह होने पर
वह उनसे है द्वेष न करता.
होने पर निवृत्त है उनसे
नहीं कामना उनकी करता. (१४.२२)
साक्षी रूप से स्थिर होकर
नहीं गुणों से विचलित होता.
केवल गुण ही कर्म कर रहे
ऐसा समझ न विचलित होता. (१४.२३)
सुख दुःख में समान है रहता,
लोहा, मिट्टी, सोना सम होता.
सम निंदा स्तुति प्रिय अप्रिय,
बुद्धिमान गुणातीत वह होता. (१४.२४)
मान अपमान बराबर जिसको,
सम व्यवहार मित्र शत्रु से होता.
करता परित्याग सभी कर्मों का
त्रिगुणों से ऊपर वह जन होता. (१४.२५)
अनन्य भाव से जो मुझको
पूर्ण भक्ति योग से भजता.
इन त्रिगुणों से परे है होकर
ब्रह्मभाव का पात्र है बनता. (१४.२६)
मैं ही अनश्वर ब्रह्म में स्थित
शाश्वत धर्म और अमृत भी.
अर्जुन मुझमें ही आश्रय समझो
एकांतिक अखंड सुख का भी. (१४.२७)
.....क्रमशः
**चौदहवां अध्याय समाप्त**
...कैलाश शर्मा

