Showing posts with label बादल. Show all posts
Showing posts with label बादल. Show all posts

Tuesday, July 01, 2014

एक टुकड़ा बादल

एक टुकड़ा बादल       
भटक कर अपनी राह
बरस गया मेरे आँगन में,
बुझा गया प्यास
वर्षों से तृषित अंतर्मन की.

बरसते हैं बादल आज भी
भिगो कर गुज़र जाते आँगन भी
पर प्यासा ही रह जाता अंतर्मन.

तलाशती हैं आँखें
बादल का वह टुकड़ा
गुज़रते घने बादलों में 
आज़ भी.

...कैलाश शर्मा