मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश:
ग्यारहवाँ अध्याय
(विश्वरूपदर्शन-योग-११.१-८)
अर्जुन
करके कृपा आपने भगवन
परम गुह्य ज्ञान बतलाया.
हे माधव! अध्यात्म ज्ञान ने
मेरे मन का मोह मिटाया. (११.१)
सर्व प्राणियों के विषयों में
जन्म मृत्यु का सुना है वर्णन.
अक्षय महात्म्य आपका भी
विस्तार पूर्वक सुना है भगवन. (११.२)
अपने विषय में जो बतलाया,
हे परमेश्वर! सच में मानता.
फिर भी ऐश्वर्य रूप आपका
दर्शन करना मन है चाहता. (११.३)
यदि आप समझते हैं प्रभु ऐसा
कर सकता उस रूप के दर्शन.
तो योगेश्वर कृपया मुझे करायें
उस अव्यय स्वरुप के दर्शन. (११.४)
श्री भगवान
मेरे सत व सहस्त्र रूपों को
जो अपरिमित पार्थ तुम देखो.
नाना प्रकार दिव्य रूपों को
विविध वर्ण, आकृतियाँ देखो. (११.५)
अश्विन, रुद्रों, मरुद्गणों को
व आदित्यों, वसुओं को देखो.
जिन्हें न तुमने देखा है पहले
उन सब आश्चर्य रूप को देखो. (११.६)
सम्पूर्ण विश्व को भी अर्जुन
सहित चराचर मुझमें देखो.
जो भी देखना चाहो भारत!
उन सबको तुम मुझ में देखो. (११.७)
अपने इन नेत्रों से अर्जुन
नहीं देख सकते तुम मुझको.
मेरी दिव्य शक्ति तुम देखो
दिव्य दृष्टि देता मैं तुम को. (११.८)
......क्रमशः
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कैलाश शर्मा
