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Thursday, September 11, 2014

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१८वां अध्याय)

                                  मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 

               अठारहवाँ अध्याय 
(मोक्षसन्यास-योग-१८.७०-७८) (अंतिम कड़ी)

धर्ममयी  इस चर्चा का 
जो भी स्वाध्याय करेगा.
ज्ञानयज्ञ के द्वारा मेरी ही 
निश्चय वह अर्चना करेगा.  (१८.७०)

परित्याग ईर्ष्या का करके 
श्रद्धायुक्त हो इसे सुनेगा.
मुक्त सभी पापों से होकर 
पुण्यलोक को प्राप्त करेगा.  (१८.७१)

क्या तुमने यह सब अर्जुन 
करके मन एकाग्र सुना है?
अज्ञानजनित मोह तुम्हारा 
क्या सुन इसको दूर हुआ है?  (१८.७२)

अर्जुन 

मोह नष्ट हो गया है मेरा 
लौट आयी है स्मृति भगवन.
सब संदेह मिट गये मेरे 
करूँगा अब आज्ञा का पालन.  (१८.७३)

संजय 

वासुदेव अर्जुन के बीच में 
जो संवाद हुआ था राजन.
रोमांचक व विस्मयकारी 
मैंने किया है उसका श्रवण.  (१८.७४)

महत कृपा व्यास जी की से
परम गुह्य संवाद सुना है.
योग ज्ञान अर्जुन को देते 
योगेश्वर से स्वयं सुना है.  (१८.७५)

केशव अर्जुन संवाद को 
बार बार सुन कर मैं राजन.
मैं आनंदविभोर हो रहा 
रोमांचित हो रहा हूँ प्रतिक्षण.  (१८.७६)

विस्मय से मैं याद हूँ करता 
अद्भुत विश्वरूप का दर्शन.
मुझे महान आश्चर्य हो रहा 
पुनः पुनः हर्षित हूँ राजन.  (१८.७७)

योगेश्वर श्री कृष्ण जहां हैं
और जहां धनुर्धर अर्जुन.
वहाँ विजय, श्री, वैभव है 
ऐसा मेरा मत है राजन.  (१८.७८)

**अठारहवां अध्याय समाप्त**

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....कैलाश शर्मा 

Wednesday, July 16, 2014

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१८वां अध्याय)

                                  मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 

      अठारहवाँ अध्याय 
(मोक्षसन्यास-योग-१८.४९-६०) 

जो आसक्तिहीन है सर्वत्र 
जीत आत्मा को है वह लेता.
विगतस्पृहा वह सन्यासी 
कर्मनिवृत्ति प्राप्त कर लेता.  (१८.४९)

नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त है करके,
कैसे वह प्राप्त ब्रह्म को करता.
जो है ज्ञान की परम उपलब्धि 
अर्जुन वह मैं संक्षेप में कहता.  (१८.५०)

विशुद्धि बुद्धि से युक्त है होकर 
संयमित आत्म धैर्य से करता.
इन्द्रिय विषयों को त्याग कर 
राग द्वेष को नष्ट है करता.  (१८.५१)

एकांतवासी व अल्प आहारी,
तन मन वाणी संयमित रखता.
ध्यान, योग में लीन सदा ही 
पूर्ण वैराग्य का पालन करता.  (१८.५२)

अहंकार बल दर्प न जाने,
काम क्रोध परिग्रह तजता.
मोहरहित शांतचित जन 
ब्रह्मभाव योग्य है बनता.  (१८.५३)

ब्रह्मभाव प्राप्त योगी को 
आकांक्षा या शोक न होता.
समभाव रख सब प्राणी में 
परमभक्ति प्राप्त है होता.  (१८.५४)

मैं जितना और जैसा हूँ 
भक्ति से है तत्व जानता.
मेरा तत्व रूप जान कर 
मुझमें ही प्रवेश है करता.  (१८.५५)

सब कर्मों को है करते भी 
जो मेरा ही आश्रय है लेता.
मेरी कृपा से है ज्ञानी जन 
परममोक्ष प्राप्त कर लेता.  (१८.५६)

सभी कर्म कर मुझे समर्पित
मुझको ही सर्वस्व मान कर.
बुद्धि योग का आश्रय लेकर
मुझमें अपना मन स्थिर कर.  (१८.५७)

मुझमें चित्त लगाकर के,
तुम दुक्खों को पार करोगे.
अहंकार तुम्हें नष्ट कर देगा 
मेरा कथन यदि नहीं सुनोगे.  (१८.५८)

अगर सोचते अहंकार वश
नहीं युद्ध करना है तुमको.
व्यर्थ सोचते प्रकृति तुम्हारी 
युद्धप्रवृत्त करेगी तुमको.  (१८.५९)

नहीं चाहते कर्म वो करना 
वशीभूत मोह के कारण.
इच्छारहित भी करना होगा 
प्रकृतिजन्य कर्म के कारण.  (१८.६०) 

          ......क्रमशः

....कैलाश शर्मा 

Monday, June 23, 2014

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१८वां अध्याय)

                                  मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 

      अठारहवाँ अध्याय 
(मोक्षसन्यास-योग-१८.३६-४८)  

हे अर्जुन! मैं अब तुम को 
तीन प्रकार के सुख बतलाता.
जिसमें करके रमण है साधक
मुक्ति सभी दुःख से है पाता.  (१८.३६)

विष के समान शुरू में लगता 
किन्तु अंत अमृत सम होता.
उसे ही सात्विक सुख कहते हैं 
निर्मल बुद्धि से पैदा जो होता.  (१८.३७)

विषय और इन्द्रिय का सुख है
अमृत सम प्रारम्भ में होता.
पर परिणाम दुखों का कारण 
ऐसा सुख है राजसिक होता.  (१८.३८)

आरम्भ व अंत जिस सुख का 
आत्मा को मोहित है करता.
निद्रा आलस्य प्रमाद से पैदा 
वह तामस सुख जाना जाता.  (१८.३९)

पृथ्वी, आकाश व देव में 
नहीं कोई भी ऐसा प्राणी.
प्रकृतिजन्य तीन गुणों से 
मुक्त हो जिनसे वह प्राणी.  (१८.४०)

कर्म ब्राह्मण व क्षत्रिय के 
और वैश्य शूद्रों के अर्जुन.
अलग अलग से गये हैं बांटे
स्वभावजनित गुणों के कारण.  (१८.४१)

शुचिता और इन्द्रियों पर संयम 
शांत चित्त तप क्षमा सरलता.
स्वभावजनित कर्म ब्राह्मण के 
ज्ञान विज्ञान और आस्तिकता.  (१८.४२)

तेज शौर्य धैर्य चतुराई, 
नहीं युद्ध से पीछे हटना.
कर्म स्वभाव से क्षत्रिय के 
दान भाव ईश्वर में रखना.  (१८.४३)

कृषि वाणिज्य और पशुपालन 
है स्वाभाविक कर्म वैश्यों का.
परिचर्या व सेवा करना 
स्वभावाजनित कर्म शूद्रों का.  (१८.४४)

स्वाभाविक कर्मों को करके 
मनुज प्राप्त संसिद्धि करता.
मैं बतलाता हूँ कैसे वह जन 
स्वकर्मों से सिद्धि है लभता.  (१८.४५)

जिससे सब प्राणी की उत्पत्ति
और विश्व व्याप्त यह रहता.
करके स्वकर्मों से अर्चना उसकी 
मनुज सिद्धि को प्राप्त है करता.  (१८.४६)

अपना गुणहीन कर्म भी होता 
श्रेष्ठ कुशल कर्म अन्य जन के.
नहीं पाप लगता है उसको 
स्वभावाजनित कर्म को कर के.  (१८.४७)

जन्मजनित कर्म को अर्जुन, 
दोषयुक्त हो फिर भी न तजते.
जैसे धुएँ से व्याप्त है अग्नि,
सभी कर्म दोष व्याप्त हैं रहते.  (१८.४८)

             .....क्रमशः

...कैलाश शर्मा 

Wednesday, May 14, 2014

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१८वां अध्याय)

                                  मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 

      अठारहवाँ अध्याय 
(मोक्षसन्यास-योग-१८.२६-३५)  

आसक्तिरहित धीर उत्साही 
अहंकार न वाणी में होता.
निर्विकार जो हार जीत में
कर्ता वह सात्विक है होता.  (१८.२६)

आसक्त, कर्मफल की इच्छा,
लोभी हिंसक अपवित्र है होता.
हर्ष और शोक युक्त जो रहता
वह राजसिक प्रवृति का होता.  (१८.२७)

अस्थिर बुद्धि विवेकशून्य है,
जिद्दी, धूर्त और अपमानी.
वह है तामस प्रवृति का होता 
करता शोक आलसी कामी.  (१८.२८)

तीन भेद बुद्धि और धृति के 
गुणानुसार सुनो हे अर्जुन!
अलग अलग से मैं करता हूँ 
तुमको उनका विस्तृत वर्णन.  (१८.२९)

कार्य अकार्य, धर्म अधर्म का 
भय अभय का भेद जानती.
बंधन और मोक्ष का अंतर 
जो है सात्विकी बुद्धि जानती.  (१८.३०)

धर्म, अधर्म, कार्य, अकार्य को 
जो यथार्थ में नहीं जानती.
ऐसी बुद्धि जगत में अर्जुन 
राजस गुण वाली कहलाती.  (१८.३१)

अंधकार से आच्छादित जो 
बुद्धि अधर्म को धर्म मानती.
वह तामसी बुद्धि है अर्जुन 
सर्व अर्थ विपरीत मानती.  (१८.३२)

अचल धैर्य व चित से अर्जुन  
मन एकाग्र योग से करता.
मन इन्द्रिय व प्राण संयमित
सदा सात्विकी जन है करता.  (१८.३३)

कर्मफलों का आकांक्षी धृति से, 
धारण अर्थ, भोग, धर्म को करता.
उनमें अत्यंत आसक्ति उसकी 
वह जन है धृति राजसी रखता.  (१८.३४)

जिस धृति के कारण दुर्बुद्धि 
स्वप्न शोक भय को अपनाता.
युक्त विषाद और मद से वह 
धृति तामसी वाला कहलाता.  (१८.३५)

               ....क्रमशः

....कैलाश शर्मा 

Saturday, May 03, 2014

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१८वां अध्याय)


                                  मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 

      अठारहवाँ अध्याय 
(मोक्षसन्यास-योग-१८.१३-२५)  

सब कर्मों की सिद्धि के हेतु
और अंत करने कर्मों को.
कहे सांख्य दर्शन में अर्जुन
पांच उपाय बताता तुमको.  (१८.१३)

शरीर अधिष्ठान कर्म का 
तथा कर्म का कर्ता होता.
इन्द्रिय और विविध कर्म हैं
हेतु पांचवां दैव है होता.  (१८.१४)

मन वाणी या शरीर से 
मनुज कर्म जो भी हैं करते.
धर्माकूल हों या न हों 
ये पाँचों निमित्त है बनते.  (१८.१५)

सब कर्मों में पांच ये हेतु 
फिर भी आत्मा को कर्ता कहता.
वह विमूढ़ दुर्बुद्धि जन है 
जो नहीं सत्य का दर्शन करता.  (१८.१६)

मैं कर्ता हूँ भाव न जिसमें, 
आसक्त न मन कर्मों में करता.
वध करके भी इन सब का,
नहीं मारता या बंधन में पडता.  (१८.१७)

ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय ये तीनों 
कर्म प्रवृति के हैं कारण होते.
साधन, कर्म और है कर्ता 
कर्मसंग्रह तीन प्रकार के होते.  (१८.१८)

गुणानुसार तीन प्रकार के 
ज्ञान, कर्म और हैं कर्ता.
शास्त्रों में इनकी व्याख्या
मैं यथार्थ में तुमको कहता.  (१८.१९)

अविनाशी अविभक्त आत्मा 
एक है सब प्राणी में देखता.
सात्विक उस ज्ञान को जानो 
जिससे ज्ञानी पुरुष देखता.  (१८.२०)

समस्त प्राणियों के अन्दर के 
भावों को अलग अलग जानता.
तुम राजस उस ज्ञान को जानो
जिससे वह ऐसा है मानता.  (१८.२१)

जो ज्ञान एक कर्म तक सीमित 
चाहे व्यर्थ और हेतु रहित है.
ऐसे ज्ञान को तुम तामस जानो.
तुच्छ और जो तत्व रहित है.  (१८.२२)

शास्त्रविहित दैनिक कर्मों को 
राग, द्वेष, मोह तज करता.
सात्विक कर्म है वह कहलाता,
जो निष्काम भाव से करता.  (१८.२३)

फलप्राप्ति को कर्म है करता 
परम कष्ट साध्य वो होता.
अहंकार से युक्त है करता 
कर्म राजसिक है वह होता.  (१८.२४)

हानि लाभ को बिना विचारे 
न सामर्थ्य है अपनी जानें.
करता कर्म मोह के वश में 
तामस ऐसे कर्म को जानें.  (१८.२५)

              .....क्रमशः
....कैलाश शर्मा 

Monday, April 07, 2014

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१८वां अध्याय)


                                  मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 

      अठारहवाँ अध्याय 
(मोक्षसन्यास-योग-१८.१-१२)  

अर्जुन :
हे महाबाहो! हे केशिनिषूदन!
हे ह्रषीकेश! मुझको बतलाओ.
सन्यास और त्याग का मतलब 
अलग अलग मुझको समझाओ.  (१८.१)

श्री भगवान :
फल की इच्छा से कर्मत्याग 
है विद्वान संन्यास समझते.
सब कर्मों के फल त्याग को
बुद्धिमान जन त्याग हैं कहते.  (१८.२)

कर्म को कुछ कहते हैं मनीषी, 
दोषयुक्त होने से त्याज्य हैं.
यज्ञ, दान, तप रूप कर्म हैं 
दूजों के मत से न त्याज्य हैं.  (१८.३)

हे भरत श्रेष्ठ! त्याग विषय में 
तुम मेरा निश्चित मत जानो.
हे पुरुष श्रेष्ठ! त्याग को तुम है 
तीन प्रकार का कहा है जानो.  (१८.४)

यज्ञ दान तप कभी न त्यागें,
करने योग्य कर्म ये होते.
यज्ञ दान तप मनीषियों को 
हैं पावन करने वाले होते.  (१८.५)

आसक्ति व कर्मफल इच्छा 
त्याग कर्म चाहिये करना.
यह ही उत्तम मत है अर्जुन 
यह मेरा है निश्चित कहना.  (१८.६)

नियत कर्म त्याग है करना
कभी न्याय संगत न होता.
परित्याग मोह के कारण,
त्याग तामसिक ही है होता.  (१८.७)

जो शारीरिक कष्टों के भय से,
दुःख रूप समझ कर्म न करता.
उस राजसिक त्याग को करके 
उसे नहीं है कोई फल मिलता.  (१८.८)

नियत कार्य को जो अर्जुन 
है कर्तव्य समझ कर करता.
उसे सात्विक त्याग हैं कहते 
तज आसक्ति और फल करता.  (१८.९)

द्वेष न दुखदायी कर्मों से, 
सुखप्रद में आसक्त न होता.
संशय रहित सत् गुण वाला
वह मेघावी त्यागी है होता.  (१८.१०)

नहीं देहधारी को संभव 
सब कर्मों का त्याग है करना.
त्यागी करते हुए कर्म भी,
फल की रखते नहीं कामना.  (१८.११)

अनिष्ट इष्ट और मिश्रित फल 
काम इक्षुक मृत्योपरांत है पाता. 
कर्म फलों का त्याग जो करता,
यह फल कभी न सन्यासी पाता.  (१८.१२)

                                  .....क्रमशः


...कैलाश शर्मा