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Thursday, August 16, 2012

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (२७वीं-कड़ी)

छठा अध्याय
(ध्यान-योग - ६.२६-३६) 


चंचल मन हो कर आकर्षित,
जब विचलित हो इधर उधर.
लौटा कर के उसे वहाँ से, 
उसे आत्म में ही स्थिर कर.  (२६)

रज गुण से जो मुक्त हो गया,
पूर्ण शान्त उसका मन होता.
है पाप रहित ऐसा जो योगी 
उत्तम सुख को प्राप्त है होता.  (२७)

मन को करके ऐसे वश में,
आत्मा में एकाग्र है करता.
पाप रहित ऐसा वह योगी,
परम मोक्ष का सुख लभता.  (२८) 

एकाग्र चित्त, समदृष्टि योगी,
आत्मा अपनी देखे सब जन में.
भेद भाव से रहित है हो कर, 
सर्व सृष्टि देखे निज मन में.  (२९)

मुझको देखे प्राणिमात्र में,
प्राणिमात्र मुझमें है देखता.
न अदृश्य मैं होता उसको,
वह अदृश्य न मुझसे रहता.  (३०)

सब जन में स्थित जो मुझको
बिना भेद भाव के है भजता.
सर्व कर्म करता वह योगी, 
मुझ में ही निवास है करता.  (३१)

सुख प्रिय दुःख अप्रिय मुझको,
वैसे ही अर्जुन औरों को होता.
अपने सदृश्य देखता सबको,
परम श्रेष्ठ योगी है वह होता.  (३२)

अर्जुन

हे मधुसूदन! समभाव योग है
दीर्घ काल क्या स्थिर होगा?
मन की चंचलता के कारण
कैसे स्थिर स्थिति में होगा?  (३३)

तन व इन्द्रिय क्षुब्ध है करता,
मन स्वभाव से ही चंचल है.
निग्रह इस बलवान चित्त का,
वायु बांधने सम मुश्किल है.  (३४)

श्री भगवान

निश्चय कठिन है मन वश करना,
यह है बहुत ही चंचल अर्जुन.
लेकिन अभ्यास वैराग्य के द्वारा,
इसका निग्रह भी है संभव.  (३५)

नहीं संयमित चित्त है जिसका,
कठिन बहुत यह योग है पाना.
आत्मा पर जिसका वश होता,
संभव योग इस युक्ति से पाना.  (३६)

              .......क्रमशः

कैलाश शर्मा