प्यार नहीं मोहताज़ किसी दिन का
यह है एक अनवरत प्रवाह
मरुथल हो या गंगा का शीतल जल,
रहता है प्रेम अव्यक्त
नहीं मांगता कोई प्रतिदान,
चाहे न चलें लेकर हाथों में हाथ
पर दूर कब होता है साथ
सुख में या दुःख में,
मौन प्रयास सुगम बनाने का
रास्ता एक दूसरे का,
क्या ज़रुरत ऐसे प्यार को
इंतज़ार किसी एक दिन का.
...कैलाश शर्मा