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Monday, May 28, 2012

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१०वीं-कड़ी)


द्वितीय अध्याय
(सांख्य योग - २.५१-५६)

कर्मजनित फल तज कर के
जन्म बंधनों से छुट जाते.
बुद्धि युक्त साधक आखिर में
परम मोक्ष पद को हैं पाते.

जब तुम अपनी बुद्धि अर्जुन
मोह कलुष से पार करोगे.
जितना सुना, सुनोगे आगे,
वैराग्य भाव उससे पाओगे.

श्रुतियों से विचलित तव बुद्धि,
जब यह निश्चल हो जायेगी.
अचल समाधि पाओगे जब,
योग अवस्था मिल जायेगी.

अर्जुन :
केशव तुम समझाओ मुझको
क्या लक्षण एकाग्र चित्त का.
कैसी वाणी, चाल चलन है 
जो स्थितप्रग्य बताओ उसका.

भगवान कृष्ण :
हो संतुष्ट स्वयं के अन्दर,
सभी कामनायें तज देता.
पार्थ, उसी साधक जन को  
स्थितप्रग्य है जाना जाता. 

होता न उद्विग्न दुखों से 
सुख की उसको चाह न होती.
राग, द्वेष, भय से ऊपर है
उसकी अविचल बुद्धि है होती.

              ......क्रमशः 

कैलाश शर्मा