(चित्र गूगल से साभार)
एक बार तेरे शहर में आकर जो बस गया,
एक बार तेरे शहर में आकर जो बस गया,
ता-उम्र फड़फडाता, किस
पिंज़रे में फ़स गया.
नज़रें नहीं मिलाता, कोई
यहाँ किसी से,
एक अज़नबी हूँ भीड़
में, यह दर्द डस गया.
रिश्तों की हर गली
से गुज़रा मैं शहर में,
स्वारथ का मकडजाल,
मुझे और क़स गया.
साये में उनकी ज़ुल्फ़
के ढूंढा किये सुकून,
वह छोड़ हम को धूप
में महलों में बस गया.
आती हैं याद मुझ को
गलियां वो गाँव की,
वह ख़्वाब अश्क़ बन के
आँखों में बस गया.
ऊंचे हैं ख़्वाब सब
के, पैरों तले ज़मीं न,
ज़ब भी गिरा ज़मीं पर,
दलदल में फ़स गया.
न मिल ही पायी मंज़िल,
गुम हो गयी हैं राहें,
इस कशमकश-ए-हयात में,
कैसे मैं फ़स गया.
....कैलाश शर्मा
