Showing posts with label मैं. Show all posts
Showing posts with label मैं. Show all posts

Thursday, November 24, 2016

समस्याएं अनेक, व्यक्ति केवल एक

समस्याएँ अनेक
उनके रूप अनेक
लेकिन व्यक्ति केवल एक।
नहीं होता स्वतंत्र अस्तित्व
किसी समस्या या दुःख का,
नहीं होती समस्या
कभी सुप्तावस्था में
जब जाग्रत होता 'मैं'
घिर जाता समस्याओं से।

मेरा 'मैं'
देता एक अस्तित्व
मेरे अहम् को
और कर देता आवृत्त
मेरे स्वत्व को।
मैं भुला देता मेरा स्वत्व
और धारण कर लेता रूप
जो सुझाता मेरा 'मैं'
अपने अहम् की पूर्ती को।

नहीं होती कोई सीमा
अहम् जनित इच्छाओं की,
अधिक पाने की दौड़ देती जन्म
ईर्ष्या, घमंड और अवसाद
और घिर जाते दुखों के भ्रमर में।

'मैं' नहीं है स्वतंत्र शरीर या सोच
जब 'मैं' जुड़ जाता
किसी अस्तित्व से
तो हो जाता आवृत्त अहम् से,
जब हो जाता साक्षात्कार
अहम् विहीन स्वत्व से
हो जाते मुक्त दुखों से
और होती प्राप्त परम शांति।


कर्म से नहीं मुक्ति मानव की
लेकिन अहम् रहित कर्म
नहीं है वर्जित 'मैं'.
हे ईश्वर! तुम ही हो कर्ता
मैं केवल एक साधन
और समर्पित सब कर्म तुम्हें
कर देता यह भाव
मुक्त कर्म बंधनों से,
और हो जाता अलोप 'मैं'
और अहम् जनित दुःख।


...©कैलाश शर्मा 

Saturday, May 21, 2016

अप्प दीपो भव

बुद्ध नहीं एक व्यक्ति विशेष
बुद्ध है बोध अपने "मैं" का
एक मार्ग पहचानने का अपने आप को,
नहीं करा सकता कोई और
पहचान मेरी मेरे "मैं" से,
मिटाना होगा स्वयं ही
अँधेरा अपने अंतस का,
'अप्प दीपो भव' नहीं केवल एक सूत्र
यह है एक शाश्वत सत्य,
अनंत प्रकाश को जीवन में 
बनना होता अपना दीप स्वयं ही,
किसी अन्य का दीपक
कर सकता रोशन राह
केवल कुछ दूर तक,
फ़िर अनंत अंधकार और भटकाव
शेष जीवन राह में।

जलाओ दीपक अपने अंतस में
समझो अर्थ अपने होने का,
बढ़ो उस राह जो हो आलोकित
स्व-प्रज्वलित ज्ञान दीप से।

...© कैलाश शर्मा 

Friday, October 23, 2015

तलाश शून्य की

भटकता तलाश में शून्य की
घिर जाता और भी
अहम् के चक्रव्यूह में,
अपनी हर सोच
अपनी हर उपलब्धि 
कर देती जटिल और भी 
चक्रव्यूह के हर घेरे को।

अहम्  खींच देता रेखा
बीच में अहम् और 'मैं' के,
अहम् की ऊँची दीवारों में
विस्मृत हो जाता 'मैं' 
अंतस के किसी कोने में,
अहम् का चक्रव्यूह कर देता दूर
स्वयं अपने से और अपनों से
और डूबने लगता मन
असीम गह्वर में अतृप्त शून्य के।


तलाश शून्य की
जब होती प्रारंभ और अंत 'मैं' पर
होने लगती पहचान 
स्वयं अपने से और अपनों से
और अनुभव एक अद्भुत शून्य का
जहाँ खो देता अस्तित्व अहम् 
गहन शून्य 'मैं' के आह्लाद में।

...©कैलाश शर्मा

Tuesday, December 17, 2013

‘मैं’ एक समस्यायें अनेक

समस्यायें अनेक
रूप अनेक
लेकिन व्यक्ति केवल एक।
नहीं होता स्वतंत्र अस्तित्व
किसी समस्या या दुःख का,
नहीं होती समस्या 
कभी सुप्तावस्था में,
जब जाग्रत होता 'मैं'
घिर जाता समस्याओं से।

मेरा 'मैं'
देता एक अस्तित्व 
मेरे अहम् को 
और कर देता आवृत्त
मेरे स्वत्व को।
मैं भुला देता मेरा स्वत्व
और धारण कर लेता रूप 
जो सुझाता मेरा 'मैं'
अपने अहम् की पूर्ती को।

नहीं होती कोई सीमा 
अहम् जनित इच्छाओं की,
अधिक पाने की दौड़ देती जन्म 
ईर्ष्या, घमंड और अवसाद 
और घिर जाते दुखों के भ्रमर में।

'मैं' नहीं है स्वतंत्र शरीर या सोच,
जब हो जाता तादात्म्य 'मैं' का 
किसी भौतिक अस्तित्व से 
तो हो जाता आवृत्त अहम् से
और बन जाता कारण दुखों 
और समस्याओं का.

कर्म से नहीं मुक्ति मानव की
लेकिन अहम् रहित कर्म 
नहीं है वर्जित 'मैं'.
हे ईश्वर! तुम ही हो कर्ता
मैं केवल एक साधन 
और समर्पित सब कर्म तुम्हें
कर देता यह भाव 
मुक्त कर्म बंधनों से,
और हो जाता अलोप 'मैं'
और अहम् जनित दुःख।

जब हो जाता तादात्म्य
अहम् विहीन ‘मैं’ का  
निर्मल स्वत्व से, 
हो जाते मुक्त दुखों से 
और होती प्राप्त परम शांति।


….कैलाश शर्मा 

Saturday, September 21, 2013

तलाश मेरे ‘मैं’ की

ढूँढता अपना अस्तित्व मेरा ‘मैं’
जो खो गया कहीं
देने में अस्तित्व अपनों के ‘मैं’ को.

अपनों के ‘मैं’ की भीड़
बढ़ गयी आगे
चढ़ा कर परत अहम की
अपने अस्तित्व पर,
छोड़ कर पीछे उस ‘मैं’ को
जिसने रखी थी आधार शिला
उन के ‘मैं’ की.

सफलता की चोटी से
नहीं दिखाई देते वे ‘मैं’
जो बन कर के ‘हम’
बने थे सीढ़ियां
पहुँचाने को एक ‘मैं’
चोटी पर.
भूल गए अहंकार जनित
अकेले ‘मैं’ का
नहीं होता कोई अस्तित्व
सुनसान चोटी पर.

काश, समझ पाता मैं भी
अस्तित्व अपने ‘मैं’ का
और न खोने देता भीड़ में
अपनों के ‘मैं’ की,
नहीं होता खड़ा आज
विस्मृत अपने ‘मैं’ से
अकेले सुनसान कोने में.


अचानक सुनसान कोने से
किसी ने पकड़ा मेरा हाथ
मुड़ के देखा जो पीछे
मेरा ‘मैं’ खड़ा था मेरे साथ
और समझाया अशक्त अवश्य हूँ
पर जीवित है स्वाभिमान 
अब भी इस ‘मैं’ में.
स्वाभिमान अशक्त हो सकता
कुछ पल को
पर नहीं कुचल पाता इसे
अहंकार किसी ‘मैं’ का,
नहीं होता कभी अकेला ‘मैं’
स्वाभिमान साथ होने पर.


....कैलाश शर्मा 

Monday, July 08, 2013

अहम् ब्रह्मास्मि

‘अहम् ब्रह्मास्मि’
नहीं है सन्निहित
कोई अहंकार इस सूत्र में,
केवल अक्षुण विश्वास
अपनी असीमित क्षमता पर.
 
‘मैं’ ही व्याप्त समस्त प्राणी में
‘मैं’ ही व्याप्त सूक्ष्मतम कण में
क्यों मैं त्यक्त करूँ इस ‘मैं’ को,
करें तादात्म जब अपने इस ‘मैं’ का
अन्य प्राणियों में स्थित ‘मैं' से
होती एक अद्भुत अनुभूति
अपने अहम् की,
नहीं होता अहंकार या ग्लानि
अपने ‘मैं’ पर.

असंभव है आगे बढ़ना
अपने ‘मैं’ का परित्याग कर के,
यही ‘मैं’ तो है एक आधार
चढ़ने का अगली सीढ़ी ‘हम’ की,
अगर नहीं होगा ‘मैं’
तो कैसे होगा अस्तित्व ‘हम’ का,
सब बिखरने लगेंगे
उद्देश्यहीन, आधारहीन दिवास्वप्न से.

‘मैं’ केवल जब ‘मैं’ न हो
समाहित हो जाये उसमें ‘हम’ भी
तब नहीं होता कोई कलुष या अहंकार,
दृष्टिगत होता रूप
केवल उस ‘मैं’ का
जो है सर्वव्यापी, संप्रभु,
और हो जाता उसका ‘मैं’
एकाकार मेरे ‘मैं’ से.

असंभव है यह सोचना भी
कि नहीं कोई अस्तित्व ‘मैं’ का,
यदि नहीं है ‘मैं’
तो नहीं कोई अस्तित्व मेरा भी,
‘मैं’ है नहीं मेरा अहंकार
‘मैं’ है मेरा विश्वास
मेरी संभावनाओं पर
मेरी क्षमता पर,
जो हैं सन्निहित सभी प्राणियों में
जब तक है उनको आभास
अपने ‘मैं’ का.


...कैलाश शर्मा