Showing posts with label Kashish-My Poetry. Show all posts
Showing posts with label Kashish-My Poetry. Show all posts
Wednesday, March 27, 2019
शब्दों की चोट
लेबल:
Kailash Sharma,
Kashish-My Poetry,
अशांत लहरें,
कंकड़,
गहराई,
झील
Tuesday, March 12, 2019
मरुधर में बोने सपने हैं
कुछ दर्द अभी तो सहने हैं,
कुछ अश्क़ अभी तो बहने हैं।
कुछ अश्क़ अभी तो बहने हैं।
मत हार अभी मांगो खुद से,
मरुधर में बोने सपने हैं।
मरुधर में बोने सपने हैं।
बहने दो नयनों से यमुना,
यादों को ताज़ा रखने हैं।
यादों को ताज़ा रखने हैं।
नींद दूर है इन आंखों से,
कैसे सपने अब सजने हैं।
कैसे सपने अब सजने हैं।
बहुत बचा कहने को तुम से,
गर सुन पाओ, वह कहने हैं।
गर सुन पाओ, वह कहने हैं।
कुछ नहीं शिकायत तुमने की,
यह दर्द हमें भी सहने हैं।
यह दर्द हमें भी सहने हैं।
हमने मिलकर जो खाब बुने,
अब दफ़्न अकेले करने हैं।
अब दफ़्न अकेले करने हैं।
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
अगज़ल,
अश्क़,
कैलाश शर्मा,
दर्द,
नींद,
मरुधर,
सपने
Thursday, February 14, 2019
क्षणिकाएं
जब
भी पीछे मुड़कर देखा
कम हो गयी गति कदमों की,
जितना गंवाया समय
बार बार पीछे देखने में
मंज़िल हो गयी उतनी ही दूर
व्यर्थ की आशा में।
कम हो गयी गति कदमों की,
जितना गंवाया समय
बार बार पीछे देखने में
मंज़िल हो गयी उतनी ही दूर
व्यर्थ की आशा में।
****
बदल जाते हैं शब्दों के अर्थ
व्यक्ति, समय, परिस्थिति अनुसार,
लेकिन मौन का होता सिर्फ एक अर्थ
अगर समझ पाओ तो।
****
व्यक्ति, समय, परिस्थिति अनुसार,
लेकिन मौन का होता सिर्फ एक अर्थ
अगर समझ पाओ तो।
****
झुलसते अल्फाज़,
कसमसाते अहसास
होने को अभिव्यक्त,
पूछती हर साँस
सबब वापिस आने का,
केवल एक तुम्हारे न होने से।
कसमसाते अहसास
होने को अभिव्यक्त,
पूछती हर साँस
सबब वापिस आने का,
केवल एक तुम्हारे न होने से।
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
अल्फाज़,
अहसास,
कैलाश शर्मा,
मंजिल,
मौन,
शब्द,
साँस
Monday, February 04, 2019
मन का आँगन प्यासा है
बरस गया सावन तो क्या है, मन का आँगन प्यासा
है।
एक बार फिर तुम मिल जाओ, केवल यह अभिलाषा है।
एक बार फिर तुम मिल जाओ, केवल यह अभिलाषा है।
अपनी अपनी राह चलें हम,
शायद नियति हमारी होगी।
मिल कर दूर सदा को होना,
विधि की यही लकीरें होंगी।
शायद नियति हमारी होगी।
मिल कर दूर सदा को होना,
विधि की यही लकीरें होंगी।
इंतज़ार के हर एक पल ने, बिखरा दिए स्वप्न आँखों
के,
रिक्त हुए हैं अश्रु नयन के, मन में गहन पिपासा है।
रिक्त हुए हैं अश्रु नयन के, मन में गहन पिपासा है।
साथ रहा जो कुछ कदमों का
जीवन भर का दर्द बन गया।
अहसासों में बसती जो गर्मी
अब स्पंदन है सर्द बन गया।
जीवन भर का दर्द बन गया।
अहसासों में बसती जो गर्मी
अब स्पंदन है सर्द बन गया।
जाने से पहले कुछ कहते, बोझ जुदाई कुछ कम
होता,
मौन दे गया प्रश्न अबूझे, अंतस में गहन कुहासा है।
मौन दे गया प्रश्न अबूझे, अंतस में गहन कुहासा है।
एक जन्म का साथ न पाया,
जन्म जन्म का स्वप्न व्यर्थ है।
फिसल गयी जो रेत हाथ से,
उसके संचय की आस व्यर्थ है।
फिसल गयी जो रेत हाथ से,
उसके संचय की आस व्यर्थ है।
स्वप्न अधिक न पालो मन में, स्वप्न टूटने पर दुख
होता,
हर पल को मुट्ठी में बांधो, जीवन बस एक तमाशा है।
हर पल को मुट्ठी में बांधो, जीवन बस एक तमाशा है।
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
अभिलाषा,
आँगन,
कुहासा,
कैलाश शर्मा,
नियति,
प्यासा,
स्वप्न
Thursday, January 17, 2019
क्षणिकाएं
मत बांटो ज़िंदगी
दिन, महीनों व सालों में,
पास है केवल यह पल
जियो यह लम्हा
एक उम्र की तरह।
पास है केवल यह पल
जियो यह लम्हा
एक उम्र की तरह।
****
रिस गयी अश्क़ों में
रिश्तों की हरारत,
ढो रहे हैं कंधों पर
बोझ बेज़ान रिश्तों का।
रिश्तों की हरारत,
ढो रहे हैं कंधों पर
बोझ बेज़ान रिश्तों का।
****
एक मौन
एक अनिर्णय
एक गलत मोड़
कर देता सृजित
एक श्रंखला
अवांछित परिणामों की,
भोगते जिन्हें अनचाहे
जीवन पर्यंत।
एक अनिर्णय
एक गलत मोड़
कर देता सृजित
एक श्रंखला
अवांछित परिणामों की,
भोगते जिन्हें अनचाहे
जीवन पर्यंत।
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
अश्क़,
उम्र,
कैलाश शर्मा,
ज़िंदगी,
मोड़,
मौन,
रिश्ते
Friday, January 04, 2019
पली गैर हाथों यह ज़िंदगी है
लेबल:
Kailash Sharma,
Kashish-My Poetry,
अगज़ल,
चांदनी,
जिंदगी,
नीयत,
बंदगी
Wednesday, December 12, 2018
क्षणिकाएं
जियो हर पल को
एक पल की तरह
सम्पूर्ण अपने आप में,
न जुड़ा है कल से
न जुड़ेगा कल से।
एक पल की तरह
सम्पूर्ण अपने आप में,
न जुड़ा है कल से
न जुड़ेगा कल से।
***
काश होता जीवन
कैक्टस पौधे जैसा,
अप्रभावित
धूप पानी स्नेह से,
खिलता जिसका फूल
तप्त मरुथल में
दूर स्वार्थी नज़रों से|
कैक्टस पौधे जैसा,
अप्रभावित
धूप पानी स्नेह से,
खिलता जिसका फूल
तप्त मरुथल में
दूर स्वार्थी नज़रों से|
***
दुहराता है इतिहास
केवल उनके लिए
जो रखते नज़र इतिहास पर।
केवल उनके लिए
जो रखते नज़र इतिहास पर।
जो चलते हैं साथ
पकड़ उंगली वर्त्तमान की,
उनका हर क़दम
बन जाता स्वयं इतिहास
अगली पीढी का।
पकड़ उंगली वर्त्तमान की,
उनका हर क़दम
बन जाता स्वयं इतिहास
अगली पीढी का।
***
धुंधलाती शाम
सिसकती हवा
टिमटिमाते कुछ स्वप्न
कसमसाते शब्द
सबूत हैं मेरे वज़ूद का।
सिसकती हवा
टिमटिमाते कुछ स्वप्न
कसमसाते शब्द
सबूत हैं मेरे वज़ूद का।
***
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
इतिहास,
कल,
कैक्टस,
कैलाश शर्मा,
क्षणिकाएं,
मरुथल,
वज़ूद
Saturday, December 01, 2018
क्षणिकाएं
नहीं चल पाता सत्य
आज अपने पैरों पर,
वक़्त ने कर दिया मज़बूर
पकड़ कर चलने को
उंगली असत्य की।
आज अपने पैरों पर,
वक़्त ने कर दिया मज़बूर
पकड़ कर चलने को
उंगली असत्य की।
***
चलते
नहीं साथ साथ
हमारे दो पैर भी
एक बढ़ता आगे
दूसरा रह जाता पीछे,
क्यूँ हो फ़िर शिकायत
जब न दे कोई साथ
जीवन के सफ़र में।
हमारे दो पैर भी
एक बढ़ता आगे
दूसरा रह जाता पीछे,
क्यूँ हो फ़िर शिकायत
जब न दे कोई साथ
जीवन के सफ़र में।
***
ढूँढते प्यार हर मुमकिन कोने में
पाते हर कोना खाली
और बैठ जाते निराशा से
पाते हर कोना खाली
और बैठ जाते निराशा से
एक कोने में.
समय करा देता अहसास
छुपी थी खुशियाँ और प्यार
अपने ही अंतर्मन में
अनजान थे जिससे अब तक।
छुपी थी खुशियाँ और प्यार
अपने ही अंतर्मन में
अनजान थे जिससे अब तक।
***
समझौता हर क़दम
अपनी खुशियों से,
कुचलना ख्वाहिशों का
जीवन के हर पल में,
क्या अर्थ ऐसे जीवन का।
अपनी खुशियों से,
कुचलना ख्वाहिशों का
जीवन के हर पल में,
क्या अर्थ ऐसे जीवन का।
समझौतों के साथ जीने से
क्या नहीं बेहतर है
अकेलेपन का सूनापन?
अकेलेपन का सूनापन?
***
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
कैलाश शर्मा,
क्षणिकाएं,
सत्य,
सूनापन
Wednesday, May 02, 2018
अनकहे शब्द
लेबल:
Kailash Sharma,
Kashish-My Poetry,
अंधड़,
ज़िंदगी,
भावनाएं,
मंजिल,
शब्द
Thursday, March 22, 2018
ज़िंदगी
जग में जब सुनिश्चित
केवल जन्म और मृत्यु
क्यों कर देते विस्मृत
आदि और अंत को,
हो जाते लिप्त
केवल जन्म और मृत्यु
क्यों कर देते विस्मृत
आदि और अंत को,
हो जाते लिप्त
अंतराल में
केवल उन कृत्यों में
जो देते क्षणिक सुख
और भूल जाते उद्देश्य
इस जग में आने का।
केवल उन कृत्यों में
जो देते क्षणिक सुख
और भूल जाते उद्देश्य
इस जग में आने का।
बहुत है अंतर ज़िंदगी गुज़ारने
और ज़िंदगी जीने में,
और ज़िंदगी जीने में,
कभी जी कर भी वर्षों तक,
कभी जी लेते भरपूर ज़िंदगी
केवल एक पल में।
...©कैलाश शर्मा
Thursday, December 14, 2017
क्षणिकाएं
ढलका नयनों से
नहीं बढ़ी
कोई उंगली
थामने पोरों पर,
गिरा सूखी रेत में
खो दिया अपना अस्तित्व,
शायद यही नसीब था
मेरे अश्क़ों का।
थामने पोरों पर,
गिरा सूखी रेत में
खो दिया अपना अस्तित्व,
शायद यही नसीब था
मेरे अश्क़ों का।
*****
आज लगा कितना अपना सा
सितारों की भीड़ में तनहा चाँद
सदियों से झेलता दर्द
प्रति दिन घटते बढ़ने का,
जब भी बढ़ता वैभव
देती चाँदनी भी साथ
लेकिन होने पर अलोप
अस्तित्व प्रकाश का
कोई भी न होता साथ.
सितारों की भीड़ में तनहा चाँद
सदियों से झेलता दर्द
प्रति दिन घटते बढ़ने का,
जब भी बढ़ता वैभव
देती चाँदनी भी साथ
लेकिन होने पर अलोप
अस्तित्व प्रकाश का
कोई भी न होता साथ.
****
काटते रहे अहसास
फसल शब्दों की,
और कुचल गए शब्द
मौन के पैरों तले।
फसल शब्दों की,
और कुचल गए शब्द
मौन के पैरों तले।
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
अश्क़,
अस्तित्व,
अहसास,
कैलाश शर्मा,
क्षणिकाएं,
चाँद,
तनहा,
मौन
Friday, October 27, 2017
चलो पथिक आगे बढ़ जाओ
चलो पथिक आगे बढ़ जाओ,
यहाँ किसी का साथ न होगा।
नियति है तेरी चलना तनहा,
यहाँ कोइ हमराह न होगा।
कुछ पल की रौनक है जीवन,
फिर आगे का सफ़र अकेला।
इक दिन अंत इसे है होना,
हर दिन कहाँ चले है मेला।
कच्चे धागे से सब रिश्ते,
कब तक साथ निभा पायेंगे।
बोझ बढाओ मत कंधों पर,
कितनी दूर उठा पायेंगे।
छांव मिलेगी नहीं राह में,
मरुथल से है तुम्हें गुज़रना|
अश्क़ रखो अपने संभाल के
अभी बहुत कुछ आगे सहना|
सक्षम करलो तुम पग अपने,
अभी राह में शूल बहुत हैं।
भ्रमित न हो खुशियों के पल में,
अभी तो मंजिल दूर बहुत है।
दुखित न हो पिछली भूलों से,
दे कर गयीं सबक जीवन का।
कौन सदा का साथ यहां है,
चलना यहां अकेला पड़ता।
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
कैलाश शर्मा,
जीवन,
तनहा,
पथिक,
बोझ,
मंजिल,
रिश्ते,
सफ़र
Thursday, September 14, 2017
दर्द को आशियां मिला
लेबल:
Kailash Sharma,
Kashish-My Poetry,
अगज़ल,
अँधेरा,
आशियाँ,
ज़िंदगी,
दर्द,
नसीब,
निशां
Sunday, July 30, 2017
Thursday, June 29, 2017
Monday, May 29, 2017
दर्द बिन ज़िंदगी नहीं होती
लेबल:
Kashish-My Poetry,
अगज़ल,
कैलाश शर्मा,
चाँद,
ज़िंदगी,
दर्द,
दवा,
नींद,
बाशिंदा
Tuesday, April 18, 2017
क्षणिकाएं
(1)
चहरे पर
जीवन के
उलझी पगडंडियां
उलझा कर रख देतीं
जीवन के हर पल को,
जीवन की संध्या में
झुर्रियों की गहराई में
ढूँढता हूँ वह पल
जो छोड़ गये निशानी
बन कर पगडंडी चहरे पर।
उलझी पगडंडियां
उलझा कर रख देतीं
जीवन के हर पल को,
जीवन की संध्या में
झुर्रियों की गहराई में
ढूँढता हूँ वह पल
जो छोड़ गये निशानी
बन कर पगडंडी चहरे पर।
(2)
होता
नहीं विस्मृत
छोड़ा था हाथ
ज़िंदगी के
जिस मोड़ पर।
छोड़ा था हाथ
ज़िंदगी के
जिस मोड़ पर।
ठहरा है
यादों का कारवां
आज भी उसी मोड़ पर,
शायद देने को साथ
मेरे प्रायश्चित में
थम गया है वक़्त भी
उसी मोड़ पर।
आज भी उसी मोड़ पर,
शायद देने को साथ
मेरे प्रायश्चित में
थम गया है वक़्त भी
उसी मोड़ पर।
(3)
आसान कहाँ हटा
देना
तस्वीर दीवार से
पुराने कैलेंडर की तरह,
टांग देते नयी तस्वीर
पुरानी ज़गह पर,
लेकिन रह जाती
खाली जगह तस्वीर के पीछे
दिलाने याद उम्र भर।
तस्वीर दीवार से
पुराने कैलेंडर की तरह,
टांग देते नयी तस्वीर
पुरानी ज़गह पर,
लेकिन रह जाती
खाली जगह तस्वीर के पीछे
दिलाने याद उम्र भर।
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
कैलाश शर्मा,
चहरा,
जीवन,
झुर्रियां,
तस्वीर,
दीवार,
पगडंडियां,
मोड़,
वक़्त
Tuesday, March 07, 2017
बेटी
आँगन है चहचहाता, जब होती बेटियां,
गुलशन है महक जाता, जब होती बेटियां।
गुलशन है महक जाता, जब होती बेटियां।
आकर के थके मांदे, घर
में क़दम रखते,
हो जाती थकन गायब, जब होती बेटियां।
हो जाती थकन गायब, जब होती बेटियां।
रोशन है रात करतीं, जुगनू सी चमक के,
जीने की लगन देती, जब होती बेटियां।
जीवन में कुछ न चाहा, बस प्यार बांटती,
दिल में है दर्द होता, गर रोती बेटियां।
जाती हैं दूर घर से, यादें हैं छोड़ कर,
आँखों में ख़ाब बन के, बस सोती बेटियां।
जाती हैं दूर घर से, यादें हैं छोड़ कर,
आँखों में ख़ाब बन के, बस सोती बेटियां।
...©कैलाश शर्मा
लेबल:
Kashish-My Poetry,
आँगन,
कैलाश शर्मा,
गुलशन,
घर,
जुगनू,
बेटियां,
यादें
Thursday, November 24, 2016
समस्याएं अनेक, व्यक्ति केवल एक
समस्याएँ अनेक
उनके रूप अनेक
लेकिन व्यक्ति केवल एक।
नहीं होता स्वतंत्र अस्तित्व
किसी समस्या या दुःख का,
नहीं होती समस्या
कभी सुप्तावस्था में
जब जाग्रत होता 'मैं'
घिर जाता समस्याओं से।
उनके रूप अनेक
लेकिन व्यक्ति केवल एक।
नहीं होता स्वतंत्र अस्तित्व
किसी समस्या या दुःख का,
नहीं होती समस्या
कभी सुप्तावस्था में
जब जाग्रत होता 'मैं'
घिर जाता समस्याओं से।
मेरा 'मैं'
देता एक अस्तित्व
मेरे अहम् को
और कर देता आवृत्त
मेरे स्वत्व को।
मैं भुला देता मेरा स्वत्व
और धारण कर लेता रूप
जो सुझाता मेरा 'मैं'
अपने अहम् की पूर्ती को।
देता एक अस्तित्व
मेरे अहम् को
और कर देता आवृत्त
मेरे स्वत्व को।
मैं भुला देता मेरा स्वत्व
और धारण कर लेता रूप
जो सुझाता मेरा 'मैं'
अपने अहम् की पूर्ती को।
नहीं होती कोई सीमा
अहम् जनित इच्छाओं की,
अधिक पाने की दौड़ देती जन्म
ईर्ष्या, घमंड और अवसाद
और घिर जाते दुखों के भ्रमर में।
अहम् जनित इच्छाओं की,
अधिक पाने की दौड़ देती जन्म
ईर्ष्या, घमंड और अवसाद
और घिर जाते दुखों के भ्रमर में।
'मैं' नहीं है स्वतंत्र शरीर या सोच
जब 'मैं' जुड़ जाता
किसी अस्तित्व से
तो हो जाता आवृत्त अहम् से,
जब हो जाता साक्षात्कार
अहम् विहीन स्वत्व से
हो जाते मुक्त दुखों से
और होती प्राप्त परम शांति।
जब 'मैं' जुड़ जाता
किसी अस्तित्व से
तो हो जाता आवृत्त अहम् से,
जब हो जाता साक्षात्कार
अहम् विहीन स्वत्व से
हो जाते मुक्त दुखों से
और होती प्राप्त परम शांति।
कर्म से नहीं मुक्ति मानव की
लेकिन अहम् रहित कर्म
नहीं है वर्जित 'मैं'.
हे ईश्वर! तुम ही हो कर्ता
मैं केवल एक साधन
और समर्पित सब कर्म तुम्हें
कर देता यह भाव
मुक्त कर्म बंधनों से,
और हो जाता अलोप 'मैं'
और अहम् जनित दुःख।
...©कैलाश शर्मा
लेकिन अहम् रहित कर्म
नहीं है वर्जित 'मैं'.
हे ईश्वर! तुम ही हो कर्ता
मैं केवल एक साधन
और समर्पित सब कर्म तुम्हें
कर देता यह भाव
मुक्त कर्म बंधनों से,
और हो जाता अलोप 'मैं'
और अहम् जनित दुःख।
...©कैलाश शर्मा
Subscribe to:
Posts (Atom)

















