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Saturday, September 26, 2015

प्रकाश स्तम्भ

प्रकाश स्तम्भ
नहीं एक मंज़िल,
सिर्फ़ एक संबल
दिग्भ्रमित नौका को,
दिखाता केवल राह
लेना होता निर्णय
चलाना होता चप्पू 
स्वयं अपने हाथों से।


आसान है सौंप देना
नाव लहरों के सहारे
शायद पहुंचे किसी तट पर
न हो जो इच्छित मंज़िल
या डूब जाए बीच धारा में,
केवल प्रकाश स्तम्भ
या पतवार नौका में
कब है पहुंचाती 
इच्छित मंज़िल को,
करनी होती स्थिर 
दृष्टि प्रकाश स्तम्भ पर,
चलाने होते पतवार अपने हाथों से
रोकने को बहने से नाव 
लहरों के साथ।

....©कैलाश शर्मा

Saturday, November 03, 2012

आख़िरी लहर


सागर की लहरें
आती हैं किनारे
देती हैं शीतलता
भिगोकर पैरों को 
कुछ पल को,
लेकिन जब लौटती हैं 
ले जाती हैं कुछ रेत
पैरों के नीचे से
और लगता है खालीपन
पैरों के नीचे.

खिसक रही है 
ज़िंदगी की रेत
धीरे धीरे हर पल
और महसूस होता है 
खालीपन जीवन में
वक़्त की हर लहर के 
जाने के बाद.

बस इंतज़ार है 
उस आख़िरी लहर का
जो बहा ले जाये 
रेत के आख़िरी कण 
और फ़िर न बचे 
कुछ बहने को
लहरों के साथ 
पैरों के नीचे से.

कैलाश शर्मा