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Wednesday, April 29, 2015

प्रकृति आक्रोश

करते जब खिलवाड़
अस्तित्व से प्रकृति की 
विकृत करते उसका रूप
विकास के नाम पर,
अंतस का आक्रोश
और आँखों के आंसू
बन जाते कभी सैलाब
कभी भूकंप
और बहा ले जाते
जो भी आता राह में.

समझो घुटन को
प्रकृति की चीत्कार को
दबी कंक्रीट के ढेर के नीचे
तरसती एक ताज़ा सांस को,
प्रकृति नहीं तुम्हारी दुश्मन
फटने लगती छाती दर्द से
देख कर दर्द अपनी संतान का.

संभलो, 
यदि संभल सको, 
अब भी.

....कैलाश शर्मा