करीने से सज़ी कब ज़िंदगी है,
यहां जो भी मिले वह ज़िंदगी है।
सदा साथ रहती कब चांदनी है,
अँधेरे से सदा अब बंदगी है।
हमारी ज़िंदगी कब थी हमारी,
पली गैर हाथों यह ज़िंदगी है।
नहीं है नज़र आती साफ़ नीयत,
जहां देखता हूँ बस गंदगी है।
दिखाओगे झूठे सपने कब तक,
सजे फिर कब है बिखर ज़िंदगी है।
...©कैलाश शर्मा