Showing posts with label चांदनी. Show all posts
Showing posts with label चांदनी. Show all posts

Friday, January 04, 2019

पली गैर हाथों यह ज़िंदगी है


करीने से सज़ी कब ज़िंदगी है,
यहां जो भी मिले वह ज़िंदगी है।

सदा साथ रहती कब चांदनी है,
अँधेरे से सदा अब बंदगी है।

हमारी ज़िंदगी कब थी हमारी,
पली गैर हाथों यह ज़िंदगी है।

नहीं है नज़र आती साफ़ नीयत,
जहां देखता हूँ बस गंदगी है।

दिखाओगे झूठे सपने कब तक,
सजे फिर कब है बिखर ज़िंदगी है।

...©कैलाश शर्मा

Sunday, January 11, 2015

आज ये दिन उदास सा गुज़रा

आज ये दिन उदास सा गुज़रा,
एक साया इधर से था गुज़रा।

यूँ तो यह शाम वक़्त से आयी,
क्यूँ है लगता कि दिन नहीं गुज़रा।

रात भर सिल रहा था गम अपने,
उनको पाया था फ़िर सुबह उधरा।

चांदनी खो गयी थी आँखों की,
चांद भी आज ग़मज़दा गुज़रा।

उम्र भर का हिसाब दूँ कैसे, 
एक पल उम्र से लंबा गुज़रा

खो गयी जाने कहाँ लब की हंसी,
आज आँखों में है सन्नाटा पसरा।

          (अगज़ल/अभिव्यक्ति)
...कैलाश शर्मा