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Thursday, May 09, 2013

अहसासों का जंगल


अहसासों के सूने जंगल में
ढूंढ रहा वे अहसास
जो हो गये गुम जीवन में
जाने किस मोड़ पर.

हर क़दम पर चुभती हैं
किरचें टूटे अहसासों की,
सहेज कर जिनको उठा लेता,
शायद कभी मिल जायें
सभी टूटे टुकड़े
और जुड़ जाये फिर से
टूटे अहसासों का आईना.

बेशक़ होंगे निशान
हरेक जोड़ पर
और न होगी वह गर्मी 
उन अहसासों में,
लेकिन कुछ तो भरेगा शून्य
अंतस के सूनेपन का.

काश जान पाता दर्द
टूटे अहसासों का,
नहीं लगाता आँगन में
पौधे कोमल अहसासों के.

...कैलाश शर्मा 

Monday, July 23, 2012

शब्द क्यों गुम हो गये

छा गयी मन में उदासी,
भाव क्यों मृत हो गये.
लेखनी भी थक गयी है,
शब्द क्यों गुम हो गये.


अश्क कोरों पर थमे हैं,
नयन देते न विदाई.
नेह चुकता जा रहा पर
आस की लौ बुझ न पायी.


देहरी थक कर खड़ी है,
पर कदम गुम हो गये.


चांदनी सी शुभ्र चादर
एक सलवट को तरसती.
मिलन का वादा नहीं था
आँख पर पथ से न हटती.


मौन हो पाया मुखर न, 
पर बयन क्यों खो गये.


मोड़ हमने खुद चुना था
राह सीधी छोड़ कर.
आज पीछे झांकते जब
कोई आता न नज़र.


दोष न प्रारब्ध का था,
हम ही खुद में खो गये.


कैलाश शर्मा