बहते अश्क़ों को रोक लिया.
अंतस को जितने घाव मिले
स्मित से उनको ढांक लिया.
विस्मृत कर अब सब रिश्तों को,
अब मैंने फ़िर जीना सीख लिया.
करतल पर खिंची लकीरों को
है ख़ुद मैंने आज खुरच डाला.
अब किस्मत की चाबी मुट्ठी में,
खोलूँगा सभी बेड़ियों का ताला.
नहीं चाह फूलों से आवृत राहें हों,
मैंने काँटों पर चलना सीख लिया.
हर घर में पड़ी खरोंचें हैं,
अहसासों की दीवारों पर.
हर सांसें आज घिसटती हैं,
अश्रु हैं रुके किनारों पर.
अब पीछे मुड़ कर मैं क्यों देखूं,
सूनी राहों पर चलना सीख लिया.
क्यूँ करूँ तिरस्कृत अँधियारा,
मैं अब इंतज़ार में सूरज के.
है रहा साथ जो जीवन भर,
कैसे चल दूँ उसको तज के.
अब एकाकीपन नहीं सताता है,
आईने में अब साथी ढूंढ लिया.
....कैलाश शर्मा

