Saturday, September 24, 2016
संवेदनहीनता
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Kashish-My Poetry,
अहसास,
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बुत,
मौन,
संवेदनहीनता
Saturday, August 27, 2016
ज़िंदगी कुछ नहीं कहा तूने
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Kashish-My Poetry,
अगज़ल/अभिव्यक्ति,
अश्क़,
ज़िंदगी,
दर्द,
मौत
Sunday, July 17, 2016
याद दे कर न तू गया होता
काश तुमसे न मैं मिला होता,
दर्द दिल में न ये पला होता।
दर्द दिल में न ये पला होता।
रौनकों की कमी न दुनिया में,
एक टुकड़ा हमें मिला होता।
एक टुकड़ा हमें मिला होता।
आसमां में हज़ार तारे हैं,
एक तारा मुझे मिला होता।
एक तारा मुझे मिला होता।
तू न मेरे नसीब में गर था,
इस जहाँ में न तू मिला होता।
ज़िंदगी कट रही बिना तेरे,
याद दे कर न तू गया होता।
नींद से टूटता नहीं नाता,
खाब तेरा न गर पला होता।
...© कैलाश शर्मा
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आसमां,
दर्द,
नसीब,
यादें
Tuesday, June 07, 2016
Saturday, May 21, 2016
अप्प दीपो भव
बुद्ध नहीं एक व्यक्ति विशेष
बुद्ध है बोध अपने "मैं" का
एक मार्ग पहचानने का अपने आप को,
नहीं करा सकता कोई और
पहचान मेरी मेरे "मैं" से,
मिटाना होगा स्वयं ही
अँधेरा अपने अंतस का,
'अप्प दीपो भव' नहीं केवल एक सूत्र
यह है एक शाश्वत सत्य,
अनंत प्रकाश को जीवन में
बनना होता अपना दीप स्वयं ही,
किसी अन्य का दीपक
कर सकता रोशन राह
केवल कुछ दूर तक,
फ़िर अनंत अंधकार और भटकाव
शेष जीवन राह में।
जलाओ दीपक अपने अंतस में
समझो अर्थ अपने होने का,
बढ़ो उस राह जो हो आलोकित
स्व-प्रज्वलित ज्ञान दीप से।
बुद्ध है बोध अपने "मैं" का
एक मार्ग पहचानने का अपने आप को,
नहीं करा सकता कोई और
पहचान मेरी मेरे "मैं" से,
मिटाना होगा स्वयं ही
अँधेरा अपने अंतस का,
'अप्प दीपो भव' नहीं केवल एक सूत्र
यह है एक शाश्वत सत्य,
अनंत प्रकाश को जीवन में
बनना होता अपना दीप स्वयं ही,
किसी अन्य का दीपक
कर सकता रोशन राह
केवल कुछ दूर तक,
फ़िर अनंत अंधकार और भटकाव
शेष जीवन राह में।
जलाओ दीपक अपने अंतस में
समझो अर्थ अपने होने का,
बढ़ो उस राह जो हो आलोकित
स्व-प्रज्वलित ज्ञान दीप से।
...© कैलाश शर्मा
Wednesday, April 20, 2016
खून अपना सफ़ेद जब होता
खून अपना सफ़ेद जब होता,
दर्द दिल में असीम तब होता।
दर्द दिल में असीम तब होता।
दर्द अपने सदा दिया करते,
गैर के पास वक़्त कब होता।
गैर के पास वक़्त कब होता।
रात गहरी सियाह जब होती,
कोइ अपना क़रीब कब होता।
कोइ अपना क़रीब कब होता।
चोट लगती ज़ुबान से ज़ब है,
घाव गहरा किसे नज़र होता।
घाव गहरा किसे नज़र होता।
बात को दफ्न आज रहने दो,
ग़र कुरेदा तो दर्द फ़िर होता।
बात कह जब
पलट गया कोई,
मौन रहना नसीब बस होता।
~©कैलाश शर्मा
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गैर,
ज़ुबान,
दफ्न,
दर्द,
बात
Thursday, February 18, 2016
क्षणिकाएं
हर खिड़की दरवाज़े
से
आ जाते यादों के झोंके
दे जाते कभी
सिहरन ठंडक की
कभी तपन लू की।
आ जाते यादों के झोंके
दे जाते कभी
सिहरन ठंडक की
कभी तपन लू की।
बंद कर
दीं
सब खिड़कियाँ, दरवाज़े
लेकिन आ जातीं दरारों से,
बहुत मुश्किल बचना
यादों के झोंकों से।
सब खिड़कियाँ, दरवाज़े
लेकिन आ जातीं दरारों से,
बहुत मुश्किल बचना
यादों के झोंकों से।
यादें कब होती मुहताज़
किसी दरवाज़े
की।
*****
उधेड़ता रहा रात भर
ज़िंदगी परत दर परत,
पाया उकेरा हर परत में
केवल तेरा अक्स,
और भी हो गए हरे
दंश तेरी यादों के।
पाया उकेरा हर परत में
केवल तेरा अक्स,
और भी हो गए हरे
दंश तेरी यादों के।
~©कैलाश शर्मा
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