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Tuesday, March 12, 2019

मरुधर में बोने सपने हैं


कुछ दर्द अभी तो सहने हैं,
कुछ अश्क़ अभी तो बहने हैं।

मत हार अभी मांगो खुद से,
मरुधर में बोने सपने हैं।

बहने दो नयनों से यमुना,
यादों को ताज़ा रखने हैं।

नींद दूर है इन आंखों से,
कैसे सपने अब सजने हैं।

बहुत बचा कहने को तुम से,
गर सुन पाओ, वह कहने हैं।

कुछ नहीं शिकायत तुमने की,
यह दर्द हमें भी सहने हैं।

हमने मिलकर जो खाब बुने,
अब दफ़्न अकेले करने हैं।

...©कैलाश शर्मा

Monday, May 29, 2017

दर्द बिन ज़िंदगी नहीं होती

दर्द जिसकी दवा नहीं होती,
ज़िंदगी फ़िर सजा नहीं होती।

चाँद आगोश में छुपा जब हो,
नींद भी नींद है नहीं होती।

ज़िंदगी साथ में गुज़र पाती,
चाँद की चांदनी नहीं रोती।

कुछ तो कह कर जो गये होते,
तस्कीने दिल कुछ हुई होती।


दर्द हर दिल का बाशिंदा है,
दर्द बिन ज़िंदगी नहीं होती।

...©कैलाश शर्मा 

Saturday, April 11, 2015

सन्नाटे की चीख ड़से है

कैसे देखूं मैं अब सपने, 
इन आँखों में अश्रु भरे हैं,
नींद खडी है दरवाज़े पर, 
हर कोने में दर्द खड़े हैं।

रातों का हर पहर डराता 
तिमिर ढांक अंतस को जाता,
रात अमावस की काली में 
कोई अस्तित्व नज़र न आता,
कैसे हाथ बढ़ा कर पकडूँ
सौगंधों के शूल गढ़े हैं।

धूमिल हुई हाथ की मेहंदी 
सजल नयन सूखे सूखे से,
भीगे भीगे भाव हैं मन के
तृषित अधर रूखे रूखे से,
नज़र चाँद की आज न उठती
तारे पहरेदार खड़े हैं।

बोझ है मन पर कितना भारी
जीवन हुआ सिर्फ लाचारी,
वर्षा ऋतु में मन बगिया की          
पतझड़ झेल रही हर क्यारी,
खुशियाँ मौन खड़ी हैं दर पर
सन्नाटे की चीख ड़से है.

...कैलाश शर्मा