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Wednesday, October 23, 2019

जीवन यात्रा


कितनी दूर चला आया हूँ,
कितनी दूर अभी है जाना।
राह है लंबी या ये जीवन,
नहीं अभी तक मैंने जाना।

नहीं किसी ने राह सुझाई,
भ्रमित किया अपने लोगों ने।
अपनी राह न मैं चुन पाया,
बहुत दूर जाने पर जाना।

बढ़े हाथ उनको ठुकराया,
अपनों की खुशियों की खातिर।
लेकिन आज सोचता हूँ मैं,
अपने दिल की क्यूँ न माना।

माना समय नहीं अब बाकी,
जो भी बचा उसे अपनाया।
जो भी रेत बचा मुट्ठी में,
उसको ही उपलब्धि माना।

...©कैलाश शर्मा

Saturday, July 06, 2019

मेरी जीवन अभिलाषा हो


तुम संबल हो, तुम आशा हो,
तुम जीवन की परिभाषा हो।

शब्दों का कुछ अर्थ न होता,
उन से जुड़ के तुम भाषा हो।

जब भी गहन अँधेरा छाता,
जुगनू बन देती आशा हो।

जीवन मंजूषा की कुंजी,
करती तुम दूर निराशा हो।

नाम न हो चाहे रिश्ते का,
मेरी जीवन अभिलाषा हो।

...©कैलाश शर्मा

Wednesday, June 05, 2019

जीवन ऐसे ही चलता है


कुछ घटता है, कुछ बढ़ता है,
जीवन ऐसे ही चलता है।

इक जैसा ज़ब रहता हर दिन,
नीरस कितना सब रहता है।

मन के अंदर है जब झांका,
तेरा ही चहरा दिखता है।

चलते चलते बहुत थका हूँ,
कांटों का ज़ंगल दिखता है।

आंसू से न प्यास बुझे है,
आगे भी मरुधर दिखता है।

...©कैलाश शर्मा

Friday, October 27, 2017

चलो पथिक आगे बढ़ जाओ

चलो पथिक आगे बढ़ जाओ,
यहाँ किसी का साथ न होगा।
नियति है तेरी चलना तनहा,
यहाँ कोइ हमराह न होगा।

कुछ पल की रौनक है जीवन,
फिर आगे का सफ़र अकेला।
इक दिन अंत इसे है होना,
हर दिन कहाँ चले है मेला।

कच्चे धागे से सब रिश्ते,
कब तक साथ निभा पायेंगे।
बोझ बढाओ मत कंधों पर,
कितनी दूर उठा पायेंगे।

छांव मिलेगी नहीं राह में,  
मरुथल से है तुम्हें गुज़रना|
अश्क़ रखो अपने संभाल के
अभी बहुत कुछ आगे सहना|      

सक्षम करलो तुम पग अपने,
अभी राह में शूल बहुत हैं।
भ्रमित न हो खुशियों के पल में
अभी तो मंजिल दूर बहुत है।

दुखित न हो पिछली भूलों से,
दे कर गयीं सबक जीवन का।
कौन सदा का साथ यहां है,
चलना यहां अकेला पड़ता।

...©कैलाश शर्मा

Tuesday, April 18, 2017

क्षणिकाएं

    (1)
चहरे पर जीवन के
उलझी पगडंडियां
उलझा कर रख देतीं
जीवन के हर पल को,
जीवन की संध्या में
झुर्रियों की गहराई में
ढूँढता हूँ वह पल
जो छोड़ गये निशानी
बन कर पगडंडी चहरे पर।

    (2)
होता नहीं विस्मृत
छोड़ा था हाथ
ज़िंदगी के
जिस मोड़ पर।
ठहरा है यादों का कारवां
आज भी उसी मोड़ पर,
शायद देने को साथ
मेरे प्रायश्चित में
थम गया है वक़्त भी
उसी मोड़ पर।


    (3)

आसान कहाँ हटा देना
तस्वीर दीवार से
पुराने कैलेंडर की तरह,
टांग देते नयी तस्वीर
पुरानी ज़गह पर,
लेकिन रह जाती
खाली जगह तस्वीर के पीछे
दिलाने याद उम्र भर।

...©कैलाश शर्मा 

Tuesday, January 19, 2016

किस किस का अहसास लिखूं मैं

मन की टूटी आस लिखूं मैं,
अंतस का विश्वास लिखूं मैं,
फूलों का खिलने से लेकर
मिटने का इतिहास लिखूं मैं।

रोटी को रोते बच्चों का,
तन के जीर्ण शीर्ण वस्त्रों का,
चौराहे बिकते यौवन का
या सपनों का ह्रास लिखूं मैं,
किस किस का इतिहास लिखूं मैं।

रिश्तों का अवसान है देखा,
बिखरा हुआ मकान है देखा,
वृद्धाश्रम कोनों से उठती
क्या ठंडी निश्वास लिखूं मैं,
क्या जीवन इतिहास लिखूं मैं।

आश्वासन होते न पूरे,
वादे रहते सदा अधूरे,
धवल वसन के पीछे काले
कर्मों का इतिहास लिखूं मैं,
टूटा किसका विश्वास लिखूं मैं।

टूट गए जब स्वप्न किसी के
मेहंदी रंग हुए जब फ़ीके,
पलकों पर ठहरे अश्क़ों की
न गिरने की आस लिखूं मैं,
किस किस का अहसास लिखूं मैं।

जीवन में अँधियारा गहरा
मौन गया आँगन में ठहरा,
कैसे अपने सूने मन की
फिर खुशियों की आस लिखूं मैं,
कैसे अपना इतिहास लिखूं मैं।

...©कैलाश शर्मा

Monday, January 04, 2016

ज़ब ज़ब शाम ढली

ज़ब ज़ब शाम ढली,
हर पल आस पली।

ज़ीवन बस उतना,
जब तक सांस चली।

दिन गुज़रा सूना,
तनहा शाम ढली।

खुशियाँ कब ठहरी,
कल पर बात टली।

सूनी राह दिखी,
मन में पीर पली।

अपना कौन यहाँ,
झूठी आस पली।

मंज़िल दूर नहीं,
सांसें टूट चली।

...©कैलाश शर्मा

Thursday, October 01, 2015

उम्र

उम्र नहीं केवल एक जोड़
हर वर्ष बढ़ते हुए कुछ अंकों का,
बढ़ते जाना अंकों का
नहीं है अर्थ
हो जाना व्यर्थ पिछले अंकों का,
उम्र नहीं केवल एक अंक
उम्र है संग्रह अनुभवों का,
उम्र है उत्साह
कदम अगला उठाने का,
उम्र है एक द्रष्टि
अँधेरे के परे प्रकाश देख पाने की,
उम्र है एक सोच
प्रति पल एक नयी उपलब्धि की।

नहीं रखता कोई अर्थ
अंको का छोटा या बड़ा होना,
उम्र है केवल एक अनुभूति
अंको से परे जीवन की
जहाँ खो देते अंक
अस्तित्व अपने होने का।

....©कैलाश शर्मा

Friday, July 03, 2015

जीवन

कानों को फोड़ता
शोर सन्नाटे का,
चीत्कार दमित शब्दों की 
छुपी मौन अंतस में,
चुभता आँखों में
काला गहरा अंधियारा,
मांगता तनहाई से
कुछ पल साथ तनहा मन,
कितना अज़ीब फ़लसफ़ा
हर बाहर जाती श्वास
निर्भर वापिस आने को
मृत्यु के अहसान पर।

....कैलाश शर्मा 

Saturday, April 11, 2015

सन्नाटे की चीख ड़से है

कैसे देखूं मैं अब सपने, 
इन आँखों में अश्रु भरे हैं,
नींद खडी है दरवाज़े पर, 
हर कोने में दर्द खड़े हैं।

रातों का हर पहर डराता 
तिमिर ढांक अंतस को जाता,
रात अमावस की काली में 
कोई अस्तित्व नज़र न आता,
कैसे हाथ बढ़ा कर पकडूँ
सौगंधों के शूल गढ़े हैं।

धूमिल हुई हाथ की मेहंदी 
सजल नयन सूखे सूखे से,
भीगे भीगे भाव हैं मन के
तृषित अधर रूखे रूखे से,
नज़र चाँद की आज न उठती
तारे पहरेदार खड़े हैं।

बोझ है मन पर कितना भारी
जीवन हुआ सिर्फ लाचारी,
वर्षा ऋतु में मन बगिया की          
पतझड़ झेल रही हर क्यारी,
खुशियाँ मौन खड़ी हैं दर पर
सन्नाटे की चीख ड़से है.

...कैलाश शर्मा  

Tuesday, January 27, 2015

मुझको दूर बहुत है चलना

थके क़दम कब तक चल पायें, 
मंज़िल नज़र नहीं आती है,
जीवन का उद्देश्य नहीं बस
केवल मील के पत्थर गिनना।

सफ़र हुआ था शुरू ज़हाँ से
कितने साथ मिले राहों में,
कभी काफ़िला साथ साथ था
अब बस सूनापन राहों में।
कैसे जीवन से हार मान लूँ,   
मुझको दूर बहुत है चलना।

बना सीढियां सदा सभी को,
पर मैं खड़ा उसी सीढ़ी पर।
मुड़ कर नहीं किसी ने देखा,
जो पहुंचा ऊपर सीढ़ी पर।
सूरज ढला मगर मैं क्यों ठहरूँ,
मुझे चाँद के साथ है चलना।

जो कुछ बीत गया जीवन में,
उस पर अश्रु बहा क्या होगा।
क्यों अंधियारे से हो समझौता,
जब प्रभात निश्चय ही होगा।
नहीं काफ़िला, मगर रुकूं क्यों,   
सूनापन लगता जब अपना।

...कैलाश शर्मा 

Monday, December 29, 2014

एक वर्ष और गया


बीता सो बीत गया,
एक वर्ष और गया।

सपने सब धूल हुए
आश्वासन भूल गया,
शहर अज़नबी रहा
और गाँव भूल गया,
एक वर्ष और गया।

तन पर न कपड़े थे
पर अलाव जलता था,
तन तो न ढक पाये
पर अलाव छूट गया,
एक वर्ष और गया।

खुशियाँ बस स्वप्न रहीं
अश्क़ न घर छोड़ सके,
जब भी सपना जागा
जाने क्यों टूट गया,
एक वर्ष और गया।

आश्वासन घट भर पाये
निकले घट सब रीते,
कल कल की आशा में
जीवन है बीत गया,
एक वर्ष और गया।

फ़िर आश्वासन आयेंगे
सपने कुछ जग जायेंगे,
लेकिन कब ठहरा है
अश्क़ जो ढुलक गया,
एक वर्ष और गया।

जब अभाव ज़ीवन हो
वर्ष बदलते कब हैं,
गुज़र दिन एक गया
समझा एक वर्ष गया,
एक वर्ष और गया।

...कैलाश शर्मा 

Tuesday, December 16, 2014

जीवन नौका

मत बांधो जीवन नौका
किसी किनारे सागर के   
रिश्तों की ड़ोर से,
आती जाती हर लहर
टकरायेगी नौका को
बार बार किनारे से,
और लौट जायेगी
देकर एक नयी चोट  
करके तन क्षत-विक्षत.

छोड़ दो नौका लहरों के सहारे,
शायद न मिले मंज़िल
पर होगा बेहतर डूब जाना
चोट लगने से अंतस को
पल पल बंधकर मज़बूर ड़ोर से.


...कैलाश शर्मा

Tuesday, December 09, 2014

घर

घर नहीं होता बेज़ानदार
छत से घिरी चार दीवारों का,
घर के एक एक कोने में 
छुपा इतिहास जीवन का।

खरोंचें संघर्ष की
जीवन के हर मोड़ की,
सीलन दीवारों पर 
बहे हुए अश्क़ों की,
यादें उन अपनों की 
जो रह गये बन के
एक तस्वीर दीवार की,
गूंजती खिलखिलाहट 
अब भी इस सूने घर में
भूले बिसरे रिश्तों व पल की,
साथ उन टूटे ख़्वाबों का 
जो संजोये थे कभी
बिखरे अभी भी हर कोने में।


अकेलापन तन का
पर नहीं सूनापन मन का 
इस घर की चार दीवारों में,
एक एक ईंट और गारे में
समाहित सम्पूर्ण जीवन इतिहास
देता है सुकून व संतुष्टि,
नहीं महसूस होता अकेलापन
इस सुनसान घर की 
चार दीवारों के बीच,
नहीं खलता मौन 
बातें करते यादों से 
इस जीवन संध्या में।

...कैलाश शर्मा 

Saturday, March 29, 2014

जीवन और मृत्यु का संघर्ष

 रश्मि प्रभा जी और किशोर खोरेन्द्र जी द्वारा संपादित काव्य-संग्रह 'बालार्क' में शामिल मेरी रचनाओं में से एक रचना 


जीवन और मृत्यु का संघर्ष
देखा है मैंने
खुली आंखों से.

केंसर अस्पताल का प्रतीक्षालय
आशा निराशा की झलक
शून्य में ताकते चेहरे,
मृत्यु की उंगली छोड़
ज़िंदगी का हाथ
पकड़ने की कोशिश,
गोल मोल मासूम बच्चा
माँ की गोद में
खेलता खिलखिलाता
अनजान हालात से
अपनी और आस पास की,
पर माँ की आँखें नम
गोद सूनी न हो जाये
इसका था गम.

हाँ मैंने सुनी है
मौत के कदमों की आहट,
रात के सन्नाटे में
हिला देती अंतस को
एक चीख
जिसे दबा देते  
नर्स और स्टाफ कुछ पल में,
पाता सुबह  
बराबर के कमरे में
एक नया मरीज़
एक नया चेहरा,
हाँ, कल रात
ज़िंदगी फिर मौत से हार गयी.

कीमोथेरेपी का ज़हर
जब बहने लगता नस नस में
अनुभव होता जीते जी जलने का,
जीने की इच्छा मर जाती
सुखकर लगती इस दर्द से मुक्ति
मृत्यु की बाहों में.
जीवन और मृत्यु की इच्छा का संघर्ष
हाँ, देखा है मैंने अपनी आँखों से.

कितना कठिन है देखना
किसी अपने की आँखों में
दर्द का सैलाब  
और जीवन मुक्ति की चाह,
देना झूठे आश्वासन
करते हुए
निश्चित मृत्यु का इंतज़ार.

जीवन और मृत्यु
दोनों ही अवश्यम्भावी  
और उनका स्वागत
ग़र आयें सुकून से,
दोनों के बीच का संघर्ष
देता है असहनीय पीड़ा
जिसे देखा है मैंने अपनी आँखों से.

आज भी जीवंत हैं
वे पल जीवन के,
कांप जाती है रूह
जब भी गुज़रता
उस सड़क से.


....कैलाश शर्मा