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Saturday, May 16, 2015

साथ आंसुओं का

हर वक़्त है तुम्हारा,
बहने लगते अनवरत
निभाते हैं साथ
दुखों के पल में,

नहीं जाते दूर
छलक जाते हैं
खुशियों के पल में


छलके थे आँखों से 
देखा ज़ब अचानक 
देहरी पर तुमको 
और छुप गए 
तुम्हारी बाहों में,
बरसे हैं फ़िर से ये 
सावन के बादल से 
देख तुम्हें जाते 
आज उसी देहरी से 

जन्म से मृत्यु तक
निरंतर साथ अश्रु का,
जाते खुशियों के साथ
माँ की आँखों में
देख मासूम सूरत
पहली बार गोद में
अपने बच्चे की, 
बरसे थे आँखों से 
छोड़ गया था जब वह
वृद्धाश्रम दरवाज़े पर,
और शायद लगें बहने
किसी के इंतज़ार में 
अंतिम यात्रा के प्रयाण में।

...© कैलाश शर्मा 

Saturday, April 11, 2015

सन्नाटे की चीख ड़से है

कैसे देखूं मैं अब सपने, 
इन आँखों में अश्रु भरे हैं,
नींद खडी है दरवाज़े पर, 
हर कोने में दर्द खड़े हैं।

रातों का हर पहर डराता 
तिमिर ढांक अंतस को जाता,
रात अमावस की काली में 
कोई अस्तित्व नज़र न आता,
कैसे हाथ बढ़ा कर पकडूँ
सौगंधों के शूल गढ़े हैं।

धूमिल हुई हाथ की मेहंदी 
सजल नयन सूखे सूखे से,
भीगे भीगे भाव हैं मन के
तृषित अधर रूखे रूखे से,
नज़र चाँद की आज न उठती
तारे पहरेदार खड़े हैं।

बोझ है मन पर कितना भारी
जीवन हुआ सिर्फ लाचारी,
वर्षा ऋतु में मन बगिया की          
पतझड़ झेल रही हर क्यारी,
खुशियाँ मौन खड़ी हैं दर पर
सन्नाटे की चीख ड़से है.

...कैलाश शर्मा