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Saturday, May 16, 2015

साथ आंसुओं का

हर वक़्त है तुम्हारा,
बहने लगते अनवरत
निभाते हैं साथ
दुखों के पल में,

नहीं जाते दूर
छलक जाते हैं
खुशियों के पल में


छलके थे आँखों से 
देखा ज़ब अचानक 
देहरी पर तुमको 
और छुप गए 
तुम्हारी बाहों में,
बरसे हैं फ़िर से ये 
सावन के बादल से 
देख तुम्हें जाते 
आज उसी देहरी से 

जन्म से मृत्यु तक
निरंतर साथ अश्रु का,
जाते खुशियों के साथ
माँ की आँखों में
देख मासूम सूरत
पहली बार गोद में
अपने बच्चे की, 
बरसे थे आँखों से 
छोड़ गया था जब वह
वृद्धाश्रम दरवाज़े पर,
और शायद लगें बहने
किसी के इंतज़ार में 
अंतिम यात्रा के प्रयाण में।

...© कैलाश शर्मा 

Saturday, March 29, 2014

जीवन और मृत्यु का संघर्ष

 रश्मि प्रभा जी और किशोर खोरेन्द्र जी द्वारा संपादित काव्य-संग्रह 'बालार्क' में शामिल मेरी रचनाओं में से एक रचना 


जीवन और मृत्यु का संघर्ष
देखा है मैंने
खुली आंखों से.

केंसर अस्पताल का प्रतीक्षालय
आशा निराशा की झलक
शून्य में ताकते चेहरे,
मृत्यु की उंगली छोड़
ज़िंदगी का हाथ
पकड़ने की कोशिश,
गोल मोल मासूम बच्चा
माँ की गोद में
खेलता खिलखिलाता
अनजान हालात से
अपनी और आस पास की,
पर माँ की आँखें नम
गोद सूनी न हो जाये
इसका था गम.

हाँ मैंने सुनी है
मौत के कदमों की आहट,
रात के सन्नाटे में
हिला देती अंतस को
एक चीख
जिसे दबा देते  
नर्स और स्टाफ कुछ पल में,
पाता सुबह  
बराबर के कमरे में
एक नया मरीज़
एक नया चेहरा,
हाँ, कल रात
ज़िंदगी फिर मौत से हार गयी.

कीमोथेरेपी का ज़हर
जब बहने लगता नस नस में
अनुभव होता जीते जी जलने का,
जीने की इच्छा मर जाती
सुखकर लगती इस दर्द से मुक्ति
मृत्यु की बाहों में.
जीवन और मृत्यु की इच्छा का संघर्ष
हाँ, देखा है मैंने अपनी आँखों से.

कितना कठिन है देखना
किसी अपने की आँखों में
दर्द का सैलाब  
और जीवन मुक्ति की चाह,
देना झूठे आश्वासन
करते हुए
निश्चित मृत्यु का इंतज़ार.

जीवन और मृत्यु
दोनों ही अवश्यम्भावी  
और उनका स्वागत
ग़र आयें सुकून से,
दोनों के बीच का संघर्ष
देता है असहनीय पीड़ा
जिसे देखा है मैंने अपनी आँखों से.

आज भी जीवंत हैं
वे पल जीवन के,
कांप जाती है रूह
जब भी गुज़रता
उस सड़क से.


....कैलाश शर्मा