Showing posts with label Kasish-My Poetry. Show all posts
Showing posts with label Kasish-My Poetry. Show all posts

Wednesday, August 23, 2017

क्षणिकाएं

व्याकुल हैं भाव
उतरने को पन्नों पर,

लेकिन सील गये पन्ने
रात भर अश्कों से,
सियाही लिखे शब्दों की
बिखर जाती पन्नों पर
और बदरंग हो जाते पन्ने
गुज़री ज़िंदगी की तरह।।
      *****

क्यों उलझ जाती ज़िंदगी 
रिश्तों के जाल में,
होता कठिन सुलझाना
इस मकड़जाल को,
न ही तोड़ पाते 
न ही सुलझा पाते 
उलझे धागे,
कितना कठिन निकलना बाहर 
और जी पाना मुक्त बंधनों से।
     *****

काश पढ़ ही लेते
अपने दिल की क़िताब,
मिल जाते उत्तर
मुझसे पूछे
अनुत्तरित प्रश्नों के।


...©कैलाश शर्मा

Sunday, March 12, 2017

दुख दर्द दहन हो होली में

दुख दर्द दहन हो होली में,
हो रंग ख़ुशी के होली में।

तन मन आंनदित हो जाये,
जब रंग उड़ेंगे होली में।

सब भेद भाव मिट जायेंगे,
जब गले मिलेंगे होली में।

जब पिया गुलाल लगायेंगे,
तन मन सिहरेगा होली में।


मन से मन का जब रंग मिले,
तन रंग न चाहे होली में।

...©कैलाश शर्मा 

Monday, February 27, 2017

कैसी यह मनहूस डगर है

भूल गयी गौरैया आँगन,
मूक हुए हैं कोयल के स्वर,
ठूठ हुआ आँगन का बरगद,
नहीं बनाता अब कोई घर।

लगती नहीं न अब चौपालें,
शोर नहीं बच्चों का होता।
झूलों को अब डाल तरसतीं,
सावन भी अब सूना होता।

पगडंडी सुनसान पडी है,
नहीं शहर से कोई आता।
कैसी यह मनहूस डगर है,
नहीं लौटता जो भी जाता।
  

कंकरीट के इस जंगल में,
अपनेपन की छाँव न पायी।
आँखों से कुछ अश्रु ढल गये,
आयी याद थी जब अमराई।


पंख कटे पक्षी के जैसे,
सूने नयन गगन को तकते।
ऐसे फसे जाल में सब हैं,
मुक्ति की है आस न करते।

...©कैलाश शर्मा 

Thursday, October 01, 2015

उम्र

उम्र नहीं केवल एक जोड़
हर वर्ष बढ़ते हुए कुछ अंकों का,
बढ़ते जाना अंकों का
नहीं है अर्थ
हो जाना व्यर्थ पिछले अंकों का,
उम्र नहीं केवल एक अंक
उम्र है संग्रह अनुभवों का,
उम्र है उत्साह
कदम अगला उठाने का,
उम्र है एक द्रष्टि
अँधेरे के परे प्रकाश देख पाने की,
उम्र है एक सोच
प्रति पल एक नयी उपलब्धि की।

नहीं रखता कोई अर्थ
अंको का छोटा या बड़ा होना,
उम्र है केवल एक अनुभूति
अंको से परे जीवन की
जहाँ खो देते अंक
अस्तित्व अपने होने का।

....©कैलाश शर्मा