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Thursday, January 17, 2019

क्षणिकाएं

मत बांटो ज़िंदगी
दिन, महीनों व सालों में,
पास है केवल यह पल
जियो यह लम्हा
एक उम्र की तरह।
****

रिस गयी अश्क़ों में
रिश्तों की हरारत,
ढो रहे हैं कंधों पर
बोझ बेज़ान रिश्तों का।
****

एक मौन
एक अनिर्णय
एक गलत मोड़
कर देता सृजित
एक श्रंखला
अवांछित परिणामों की,
भोगते जिन्हें अनचाहे
जीवन पर्यंत।

...©कैलाश शर्मा

Thursday, October 01, 2015

उम्र

उम्र नहीं केवल एक जोड़
हर वर्ष बढ़ते हुए कुछ अंकों का,
बढ़ते जाना अंकों का
नहीं है अर्थ
हो जाना व्यर्थ पिछले अंकों का,
उम्र नहीं केवल एक अंक
उम्र है संग्रह अनुभवों का,
उम्र है उत्साह
कदम अगला उठाने का,
उम्र है एक द्रष्टि
अँधेरे के परे प्रकाश देख पाने की,
उम्र है एक सोच
प्रति पल एक नयी उपलब्धि की।

नहीं रखता कोई अर्थ
अंको का छोटा या बड़ा होना,
उम्र है केवल एक अनुभूति
अंको से परे जीवन की
जहाँ खो देते अंक
अस्तित्व अपने होने का।

....©कैलाश शर्मा

Saturday, April 20, 2013

२००वीं पोस्ट - हैवानियत


                                     (चित्र गूगल से साभार)
क्यों पसरती जा रही
हैवानियत इंसानों में,
क्यों घटता जा रहा अंतर
मानव और दानव में,
क्यों हो गया मानव
घृणित दानव से भी?

भूल गया सभी रिश्ते और उम्र
दिखाई देती केवल एक देह,
बेमानी हो गए शब्द
प्रेम, वात्सल्य और स्नेह,
आँखों में है केवल भूख
झिंझोड़ने की एक देह,
कानून व्यवस्था सब बेमानी
बंधी हुई है पट्टी आँखों पर,
देखने तमाशा जुड़ जाती भीड़
पर बढ़ता नहीं कोई हाथ
करने को सामना.

नहीं आयेगी कोई दुर्गा
करने दानव दलन,
उठना होगा तुम्हें ही
बनना होगा दुर्गा
करने दानवों का शमन,
उठाओ खड्ग और खप्पर
पीने को लहू इन रक्तबीजों का,
गिरने न पाए लहू की
एक बूँद भी पृथ्वी पर,
पैदा न हो पाए फिर कोई
रक्तबीज धरा पर.

......कैलाश शर्मा